श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकल्याणकारी, असूयारहित, समस्त प्राणियोंके प्रति प्रिय वचन बोलनेवाले और सत्यवादी हैं॥ ३१-३२ ॥
‘वे बहुश्रुत विद्वानों, बड़े-बूढ़ों तथा ब्राह्मणोंके उपासक हैं—सदा ही उनका संग किया करते हैं, इसलिये इस जगत्में श्रीरामकी अनुपम कीर्ति, यश और तेजका विस्तार हो रहा है॥ ३३ ॥
‘देवता, असुर और मनुष्योंके सम्पूर्ण अस्त्रोंका उन्हें विशेषरूपसे ज्ञान है। वे साङ्ग वेदके यथार्थ विद्वान् और सम्पूर्ण विद्याओंमें भलीभाँति निष्णात हैं॥ ३४ ॥
‘भरतके बड़े भाई श्रीराम गान्धर्ववेद (संगीतशास्त्र)में भी इस भूतलपर सबसे श्रेष्ठ हैं। कल्याणकी तो वे जन्मभूमि हैं। उनका स्वभाव साधु पुरुषोंके समान है, हृदय उदार और बुद्धि विशाल है॥ ३५ ॥
‘धर्म और अर्थके प्रतिपादनमें कुशल श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने उन्हें उत्तम शिक्षा दी है। वे ग्राम अथवा नगरकी रक्षाके लिये लक्ष्मणके साथ जब संग्रामभूमिमें जाते हैं, उस समय वहाँ जाकर विजय प्राप्त किये बिना पीछे नहीं लौटते॥ ३६ १/२ ॥
‘संग्रामभूमिसे हाथी अथवा रथके द्वारा पुनः अयोध्या लौटनेपर वे पुरवासियोंसे स्वजनोंकी भाँति प्रतिदिन उनके पुत्रों, अग्निहोत्रकी अग्नियों, स्त्रियों, सेवकों और शिष्योंका कुशल-समाचार पूछते रहते हैं॥
‘जैसे पिता अपने औरस पुत्रोंका कुशल-मङ्गल पूछता है, उसी प्रकार वे समस्त पुरवासियोंसे क्रमशः उनका सारा समाचार पूछा करते हैं। पुरुषसिंह श्रीराम ब्राह्मणोंसे सदा पूछते रहते हैं कि ‘आपके शिष्य आपलोगोंकी सेवा करते हैं न?’ क्षत्रियोंसे यह जिज्ञासा करते हैं कि ‘आपके सेवक कवच आदिसे सुसज्जित हो आपकी सेवामें तत्पर रहते हैं न?’॥ ३९ १/२ ॥
‘नगरके मनुष्योंपर संकट आनेपर वे बहुत दुःखी हो जाते हैं और उन सबके घरोंमें सब प्रकारके उत्सव होनेपर उन्हें पिताकी भाँति प्रसन्नता होती है॥ ४० १/२ ॥
‘वे सत्यवादी, महान् धनुर्धर, वृद्ध पुरुषोंके सेवक और जितेन्द्रिय हैं। श्रीराम पहले मुसकराकर वार्तालाप आरम्भ करते हैं। उन्होंने सम्पूर्ण हृदयसे धर्मका आश्रय ले रखा है। वे कल्याणका सम्यक् आयोजन करनेवाले हैं, निन्दनीय बातोंकी चर्चामें उनकी कभी रुचि नहीं होती है॥ ४१-४२ ॥