श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें‘आर्ये! मैंने श्रेष्ठ स्त्रियों—माता आदिके मुखसे नारीके सामान्य और विशेष धर्मोंका श्रवण किया है। इस प्रकार पातिव्रत्यका महत्त्व जानकर भी मैं पतिका क्यों अपमान करूँगी? मैं जानती हूँ कि पति ही स्त्रीका देवता है’॥ ३१ ॥
सीताका यह मनोहर वचन सुनकर शुद्ध अन्तःकरणवाली देवी कौसल्याके नेत्रोंसे सहसा दुःख और हर्षके आँसू बहने लगे॥ ३२ ॥
तब परम धर्मात्मा श्रीरामने माताओंके बीचमें अत्यन्त सम्मानित होकर खड़ी हुई माता कौसल्याकी ओर देख हाथ जोड़कर कहा—॥ ३३ ॥
‘माँ! (इन्हींके कारण मेरे पुत्रका वनवास हुआ है; ऐसा समझकर) तुम मेरे पिताजीकी ओर दुःखित होकर न देखना। वनवासकी अवधि भी शीघ्र ही समाप्त हो जायगी॥ ३४ ॥
‘ये चौदह वर्ष तो तुम्हारे सोते-सोते निकल जायँगे, फिर एक दिन देखोगी कि मैं अपने सुहृदोंसे घिरा हुआ सीता और लक्ष्मणके साथ सम्पूर्णरूपसे यहाँ आ पहुँचा हूँ’॥ ३५ ॥
मातासे इस प्रकार अपना निश्चित अभिप्राय बताकर दशरथनन्दन श्रीरामने अपनी अन्य साढ़े तीन सौ माताओंकी ओर दृष्टिपात किया और उनको भी कौसल्याकी ही भाँति शोकाकुल पाया। तब उन्होंने हाथ जोड़कर उन सबसे यह धर्मयुक्त बात कही—॥ ३६-३७ ॥
‘माताओ! सदा एक साथ रहनेके कारण मैंने जो कुछ कठोर वचन कह दिये हों अथवा अनजानमें भी मुझसे जो अपराध बन गये हों, उनके लिये आप मुझे क्षमा कर दें। मैं आप सब माताओंसे विदा माँगता हूँ’॥ ३८ ॥
राजा दशरथकी उन सभी स्त्रियोंने श्रीरघुनाथजीका यह समाधानकारी धर्मयुक्त वचन सुना, सुनकर उन सबका चित्त शोकसे व्याकुल हो गया॥ ३९ ॥
श्रीरामके ऐसी बात कहते समय महाराज दशरथकी रानियाँ कुररियोंके समान विलाप करने लगीं। उनका वह आर्तनाद उस राजभवनमें सब ओर गूँज उठा॥ ४० ॥
राजा दशरथका जो भवन पहले मुरज, पणव और मेघ आदि वाद्योंके गम्भीर घोषसे गूँजता रहता था, वही विलाप और रोदनसे व्याप्त हो संकटमें पड़कर अत्यन्त दुःखमय प्रतीत होने लगा॥ ४१ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें उनतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३९॥