भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 591

आश्रममें पहुँचकर महर्षिके दर्शनकी इच्छावाले सीतासहित वे दोनों वीर कुछ दूरपर ही खड़े हो गये॥

(दूर खड़े हो महर्षिके शिष्यसे अपने आगमनकी सूचना दिलवाकर भीतर आनेकी अनुमति प्राप्त कर लेनेके बाद) पर्णशालामें प्रवेश करके उन्होंने तपस्याके प्रभावसे तीनों कालोंकी सारी बातें देखनेकी दिव्य दृष्टि प्राप्त कर लेनेवाले एकाग्रचित्त तथा तीक्ष्ण व्रतधारी महात्मा भरद्वाज ऋषिका दर्शन किया, जो अग्निहोत्र करके शिष्योंसे घिरे हुए आसनपर विराजमान थे। महर्षिको देखते ही लक्ष्मण और सीतासहित महाभाग श्रीरामने हाथ जोड़कर उनके चरणोंमें प्रणाम किया॥ ११-१२ ॥

तत्पश्चात् लक्ष्मणके बड़े भाई श्रीरघुनाथजीने उनसे इस प्रकार अपना परिचय दिया—‘भगवन्! हम दोनों राजा दशरथके पुत्र हैं। मेरा नाम राम और इनका लक्ष्मण है तथा ये विदेहराज जनककी पुत्री और मेरी कल्याणमयी पत्नी सती साध्वी सीता हैं, जो निर्जन तपोवनमें भी मेरा साथ देनेके लिये आयी हैं॥ १३-१४ ॥

‘पिताकी आज्ञासे मुझे वनकी ओर आते देख ये मेरे प्रिय अनुज भाई सुमित्राकुमार लक्ष्मण भी वनमें ही रहनेका व्रत लेकर मेरे पीछे-पीछे चले आये हैं॥ १५ ॥

‘भगवन्! इस प्रकार पिताकी आज्ञासे हम तीनों तपोवनमें जायँगे और वहाँ फल-मूलका आहार करते हुए धर्मका ही आचरण करेंगे’॥ १६ ॥

परम बुद्धिमान् राजकुमार श्रीरामका वह वचन सुनकर धर्मात्मा भरद्वाज मुनिने उनके लिये आतिथ्य-सत्कारके रूपमें एक गौ तथा अर्घ्य-जल समर्पित किये॥ १७ ॥

उन तपस्वी महात्माने उन सबको नाना प्रकारके अन्न, रस और जंगली फल-मूल प्रदान किये। साथ ही उनके ठहरनेके लिये स्थानकी भी व्यवस्था की॥ १८ ॥

महर्षिके चारों ओर मृग, पक्षी और ऋषि-मुनि बैठे थे और उनके बीचमें वे विराजमान थे। उन्होंने अपने आश्रमपर अतिथिरूपमें पधारे हुए श्रीरामका स्वागतपूर्वक सत्कार किया। उनके उस सत्कारको ग्रहण करके श्रीरामचन्द्रजी जब आसनपर विराजमान हुए, तब भरद्वाजजीने उनसे यह धर्मयुक्त वचन कहा— ॥

‘ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम! मैं इस आश्रमपर दीर्घकालसे तुम्हारे शुभागमनकी प्रतीक्षा कर रहा हूँ (आज मेरा मनोरथ सफल हुआ है)। मैंने यह भी सुना है कि तुम्हें अकारण ही वनवास दे दिया गया है॥ २१ ॥