श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभी प्राप्य है।^२ इसका नाम ‘रामायणतात्पर्यदीपिका’ है। इसका उल्लेख दीवानबहादुर रामशास्त्रीने अपनी पुस्तक ‘स्टडीज इन रामायण’ के द्वितीय खण्डमें किया है। यह पुस्तक १९४४ ई०में बड़ौदासे प्रकाशित है। द्रोणपर्वके १४३ । ६६-६७ श्लोकोंमें महर्षि वाल्मीकिके युद्धकाण्डके ८१ । २८ को नामोल्लेखपूर्वक श्लोकका हवाला दिया गया है।^३ ‘अग्निपुराण’ के ५ से १३ तकके अध्यायोंमें ‘वाल्मीकि’ के नामोल्लेखपूर्वक रामायणसारका वर्णन है। गरुडपुराण, पूर्वखण्डके १४३ वें अध्यायमें भी ठीक इन्हीं श्लोकोंमें रामायणसार कथन है। इसी प्रकार हरिवंश (विष्णुपर्व ९३ । ६—३३) में भी यदुवंशियोंद्वारा वाल्मीकिरामायणके नाटक खेलनेका उल्लेख है—
रामायणं महाकाव्यमुद्दिश्य नाटकं कृतम्।
श्रीव्यासदेवजीने वाल्मीकिकी जीवनी भी बड़ी श्रद्धासे ‘स्कन्दपुराण’ वैष्णवखण्ड, वैशाखमाहात्म्य १७ से २० अध्यायोंतक (‘कल्याण’ सं० स्कन्दपुराणाङ्क पृ० ३७४ से ३८१ तक), आवन्त्यखण्ड अवन्तीक्षेत्रमाहात्म्यके २४ वें अध्यायमें (‘कल्याण’ संक्षिप्त स्कन्दपुराणाङ्क पृ० ७०८-९), प्रभासखण्डके २७८ वें अध्यायमें (सं० स्कन्दपुराणाङ्क पृ० १०२५—२७) तथा अध्यात्मरामायणके अयोध्याकाण्डमें (६ । ६४—९२) वर्णन किया है। मत्स्यपुराण १२ । ६१ में वे इन्हें ‘भार्गवसत्तम’ से स्मरण करते हैं^४ और भागवत ६ । १८ । ५ में ‘महायोगी’ से।
इसी प्रकार कविकुलतिलक कालिदासने रघुवंशमें आदिकविको दो बार स्मरण किया है। एक तो—‘कविः कुशेध्माहरणाय यातः। निषादविद्धाण्डजदर्शनोत्थः श्लोक-त्वमापद्यत यस्य शोकः^५॥’ (१४ । ७०) इस श्लोकमें, दूसरे २ । ४ के ‘पूर्वसूरिभिः’ में। भवभूतिको करुणरसका आचार्य माना गया है, किंतु हम देखते हैं कि उन्हें इसकी शिक्षा आदिकविसे ही मिली है। वे भी उत्तररामचरितके दूसरे अङ्कमें ‘वाल्मीकिपार्श्वादिह पर्यटामि’ ‘मुनयस्तमेव हि पुराणब्रह्मवादिनं प्राचेतसमृषिं..... उपास्ते’ आदिसे उन्हींका स्मरण करते हैं। ‘सुभाषितपद्धति’ के निर्माता शार्ङ्गधर उनके इस ऋणको स्पष्ट व्यक्त करते हुए लिखते हैं—
कवीन्द्रं नौमि वाल्मीकिं यस्य रामायणीकथाम्।
चन्द्रिकामिव चिन्वन्ति चकोरा इव साधवः॥
इसी तरह महाकवि भास, आचार्य शङ्कर, रामानुजादि सभी सम्प्रदायाचार्य, राजा भोज आदि परवर्ती विद्वानोंसे लेकर हिंदीसाहित्यके प्राण गोस्वामी तुलसीदासजीतकने ‘बंदउँ मुनि पद कंजु रामायन जेहिं निरमयउ’ ‘जान आदिकबि नाम प्रतापू’, ‘बालमीकि भे ब्रह्म समाना’