भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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उनसठवाँ सर्ग

सुमन्त्रद्वारा श्रीरामके शोकसे जड-चेतन एवं अयोध्यापुरीकी दुरवस्थाका वर्णन तथा राजा दशरथका विलाप

सुमन्त्रने कहा—‘जब श्रीरामचन्द्रजी वनकी ओर प्रस्थित हुए, तब मैंने उन दोनों राजकुमारोंको हाथ जोड़कर प्रणाम किया और उनके वियोगके दुःखको हृदयमें धारण करके रथपर आरूढ़ हो उधरसे लौटा। लौटते समय मेरे घोड़े नेत्रोंसे गरम-गरम आँसू बहाने लगे। रास्ता चलनेमें उनका मन नहीं लगता था॥ १-२ ॥

‘मैं गुहके साथ कई दिनोंतक वहाँ इस आशासे ठहरा रहा कि सम्भव है, श्रीराम फिर मुझे बुला लें॥ ३ ॥

‘महाराज! आपके राज्यमें वृक्ष भी इस महान् संकटसे कृशकाय हो गये हैं, फूल, अंकुर और कलियोंसहित मुरझा गये हैं॥ ४ ॥

‘नदियों, छोटे जलाशयों तथा बड़े सरोवरोंके जल गरम हो गये हैं। वनों और उपवनोंके पत्ते सूख गये हैं॥

‘वनके जीव-जन्तु आहारके लिये भी कहीं नहीं जाते हैं। अजगर आदि सर्प भी जहाँ-के-तहाँ पड़े हैं, आगे नहीं बढ़ते हैं। श्रीरामके शोकसे पीड़ित हुआ वह सारा वन नीरव-सा हो गया है॥ ६ ॥

‘नदियोंके जल मलिन हो गये हैं। उनमें फैले हुए कमलोंके पत्ते गल गये हैं। सरोवरोंके कमल भी सूख गये हैं। उनमें रहनेवाले मत्स्य और पक्षी भी नष्टप्राय हो गये हैं॥ ७ ॥

‘जलमें उत्पन्न होनेवाले पुष्प तथा स्थलसे पैदा होनेवाले फूल भी बहुत थोड़ी सुगन्धसे युक्त होनेके कारण अधिक शोभा नहीं पाते हैं तथा फल भी पूर्ववत् नहीं दृष्टिगोचर होते हैं॥ ८ ॥

‘नरश्रेष्ठ! अयोध्याके उद्यान भी सूने हो गये हैं, उनमें रहनेवाले पक्षी भी कहीं छिप गये हैं। यहाँके बगीचे भी मुझे पहलेकी भाँति मनोहर नहीं दिखायी देते हैं॥ ९ ॥

‘अयोध्यामें प्रवेश करते समय मुझसे किसीने प्रसन्न होकर बात नहीं की। श्रीरामको न देखकर लोग बारंबार लंबी साँसें खींचने लगे॥ १० ॥