श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 670, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ें‘मेरे शरीरसे इनकी उत्पत्ति हुई है। ये दोनों भारसे पीड़ित और दुःखी हैं, इसीलिये इन्हें देखकर मैं शोकसे संतप्त हो रही हूँ; क्योंकि पुत्रके समान प्रिय दूसरा कोई नहीं है’॥ २४ ॥
‘जिनके सहस्रों पुत्रोंसे यह सारा जगत् भरा हुआ है, उन्हीं कामधेनुको इस तरह रोती देख इन्द्रने यह माना कि पुत्रसे बढ़कर और कोई नहीं है॥ २५ ॥
‘देवेश्वर इन्द्रने अपने शरीरपर उस पवित्र गन्धवाले अश्रुपातको देखकर देवी सुरभिको इस जगत्में सबसे श्रेष्ठ माना॥ २६ ॥
‘जिनका चरित्र समस्त प्राणियोंके लिये समान रूपसे हितकर और अनुपम है, जो अभीष्ट दानरूप ऐश्वर्यशक्तिसे सम्पन्न, सत्यरूप प्रधान गुणसे युक्त तथा लोकरक्षाकी कामनासे कार्यमें प्रवृत्त होनेवाली हैं और जिनके सहस्रों पुत्र हैं, वे कामधेनु भी जब अपने दो पुत्रोंके लिये उनके स्वाभाविक चेष्टामें रत होनेपर भी कष्ट पानेके कारण शोक करती हैं तब जिनके एक ही पुत्र है, वे माता कौसल्या श्रीरामके बिना कैसे जीवित रहेंगी?॥ २७-२८ ॥
‘इकलौते बेटेवाली इन सती-साध्वी कौसल्याका तूने उनके पुत्रसे बिछोह करा दिया है, इसलिये तू सदा ही इस लोक और परलोकमें भी दुःख ही पायेगी॥ २९ ॥
‘मैं तो यह राज्य लौटाकर भाईकी पूजा करूँगा और यह सारा अन्त्येष्टिसंस्कार आदि करके पिताका भी पूर्णरूपसे पूजन करूँगा तथा निःसंदेह मैं वही कर्म करूँगा, जो (तेरे दिये हुए कलङ्कको मिटानेवाला और) मेरे यशको बढ़ानेवाला हो॥ ३० ॥
‘महाबली महाबाहु कोसलनरेश श्रीरामको यहाँ लौटा लाकर मैं स्वयं ही मुनिजनसेवित वनमें प्रवेश करूँगा॥
‘पापपूर्ण संकल्प करनेवाली पापिनि! पुरवासी मनुष्य आँसू बहाते हुए अवरुद्धकण्ठ हो मुझे देखें और मैं तेरे किये हुए इस पापका बोझ ढोता रहूँ—यह मुझसे नहीं हो सकता॥ ३२ ॥
‘अब तू जलती आगमें प्रवेश कर जा, या स्वयं दण्डकारण्यमें चली जा अथवा गलेमें रस्सी बाँधकर प्राण दे दे, इसके सिवा तेरे लिये दूसरी कोई गति नहीं है॥ ३३ ॥
‘सत्यपराक्रमी श्रीरामचन्द्रजी जब अयोध्याकी भूमिपर पदार्पण करेंगे, तभी मेरा कलङ्क दूर होगा और तभी मैं कृतकृत्य होऊँगा’॥ ३४ ॥
यह कहकर भरत वनमें तोमर और अंकुशद्वारा पीड़ित किये गये हाथीकी भाँति मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़े और क्रोधमें भरकर फुफकारते हुए साँपकी भाँति लम्बी साँस खींचने