भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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(रामचरितमानस), 'जहाँ बालमीकि भए ब्याधतें मुनिंदु साधु' 'मरा मरा' 'जपें सिख सुनि रिषि सातकी' (कवितावली, उत्तरकाण्ड १३८ से १४०), 'कहत मुनीस महेस महातम उलटे सीधे नामको' 'महिमा उलटे नामकी मुनि कियो किरातो।' (विनयपत्रिका १५६, १५१), 'उलटा जपत कोलते भए ऋषिराव' (बरवै रामा० ५४), 'राम बिहाइ मरा जपते बिगरी सुधरी कबि कोकिलहू की' (कवि० ७ । ८८) इत्यादि पदोंसे इनका बार-बार श्रद्धापूर्वक स्मरण किया है; कृतज्ञता ज्ञापन की है।

संक्षिप्त जीवनी

महर्षि वाल्मीकिजीको कुछ लोग निम्न जातिका बतलाते हैं। पर वाल्मीकिरामायण ७ । ९६ । १९, ७। ९३ । १७ तथा अध्यात्मरामायण ७ । ७ । ३१ में इन्होंने स्वयं अपनेको प्रचेताका पुत्र कहा है। मनुस्मृति १ । ३५ में 'प्रचेतसं वसिष्ठं च भृगुं नारदमेव च' प्रचेताको वसिष्ठ, नारद, पुलस्त्य, कवि आदिका भाई लिखा है। स्कन्दपुराणके वैशाखमाहात्म्यमें इन्हें जन्मान्तरका व्याध बतलाया है। इससे सिद्ध है कि जन्मान्तरमें ये व्याध थे। व्याध-जन्मके पहले भी स्तम्भ नामके श्रीवत्सगोत्रीय ब्राह्मण थे। व्याध-जन्ममें शङ्ख ऋषिके सत्सङ्गसे, रामनामके जपसे ये दूसरे जन्ममें (४) 'अग्निशर्मा' (मतान्तरसे रत्नाकर) हुए। वहाँ भी व्याधोंके सङ्गसे कुछ दिन प्राक्तन संस्कारवश व्याध-कर्ममें लगे। फिर, सप्तर्षियोंके सत्संगसे मरा-मरा जपकर—बाँबी पड़नेसे वाल्मीकि नामसे ख्यात हुए और वाल्मीकि-रामायणकी रचना की। ('कल्याण' सं० स्कन्दपुराणाङ्क पृ० ३८१; ७०९; १०२४) बंगलाके कृत्तिवासरामायण, मानस, अध्यात्मरामा० २ । ६ । ६४ से ९२, आनन्दरामायण राज्यकाण्ड १४ । २१—४९, भविष्यपुराण प्रतिसर्ग० ४। १० में भी यह कथा थोड़े हेर-फेरसे स्पष्ट है। गोस्वामी तुलसीदासजीने वस्तुतः यह कथा निराधार नहीं लिखी। अतएव इन्हें नीच जातिका मानना सर्वथा भ्रममूलक है।

प्राचीन संस्कृत टीकाएँ

वाल्मीकिरामायणपर अगणित प्राचीन टीकाएँ हैं, यथा—१ कतक टीका (इसका नागोजीभट्ट तथा गोविन्द- राजादिने बहुत उल्लेख किया है), २—नागोजीभट्टकी तिलक या रामाभिरामी व्याख्या, ३—गोविन्दराजकी भूषण टीका, ४—शिवसहायकी रामायण-शिरोमणि व्याख्या, (ये पूर्वोक्त तीनों टीकाएँ गुजराती प्रिंटिङ्ग प्रेस बम्बईसे एकमें ही छपी हैं।) ५—माहेश्वरतीर्थकी तीर्थव्याख्या या तत्त्वदीप, ६—कन्दाल रामानुजकी रामानुजीयव्याख्या; (ये टीकाएँ वेंकटेश्वर प्रेस बम्बईसे छपी हैं।) ७—वरदराजकृत विवेकतिलक, ८—त्र्यम्बकराज मखानीकी धर्माकूत-व्याख्या (यह खण्डशः मद्रास एवं श्रीरङ्गमसे छपी है) और ९—