भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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सतासीवाँ सर्ग

भरतकी मूर्च्छासे गुह, शत्रुघ्न और माताओंका दुःखी होना, होशमें आनेपर भरतका गुहसे श्रीराम आदिके भोजन और शयन आदिके विषयमें पूछना और गुहका उन्हें सब बातें बताना

गुहका श्रीरामके जटाधारण आदिसे सम्बन्ध रखनेवाला अत्यन्त अप्रिय वचन सुनकर भरत चिन्तामग्न हो गये। जिन श्रीरामके विषयमें उन्होंने अप्रिय बात सुनी थी, उन्हींका वे चिन्तन करने लगे (उन्हें यह चिन्ता हो गयी कि अब मेरा मनोरथ पूर्ण न हो सकेगा। श्रीरामने जब जटा धारण कर ली, तब वे शायद ही लौटें)॥ १ ॥

भरत सुकुमार होनेके साथ ही महान् बलशाली थे, उनके कंधे सिंहके समान थे, भुजाएँ बड़ी-बड़ी और नेत्र विकसित कमलके सदृश सुन्दर थे। उनकी अवस्था तरुण थी और वे देखनेमें बड़े मनोरम थे। उन्होंने गुहकी बात सुनकर दो घड़ीतक किसी प्रकार धैर्य धारण किया, फिर उनके मनमें बड़ा दुःख हुआ। वे अंकुशसे विद्ध हुए हाथीके समान अत्यन्त व्यथित होकर सहसा दुःखसे शिथिल एवं मूर्च्छित हो गये॥ २-३ ॥

भरतको मूर्च्छित हुआ देख गुहके चेहरेका रंग उड़ गया। वह भूकम्पके समय मथित हुए वृक्षकी भाँति वहाँ व्यथित हो उठा॥ ४ ॥

शत्रुघ्न भरतके पास ही बैठे थे। वे उनकी वैसी अवस्था देख उन्हें हृदयसे लगाकर जोर-जोरसे रोने लगे और शोकसे पीड़ित हो अपनी सुध-बुध खो बैठे॥ ५ ॥

तदनन्तर भरतकी सभी माताएँ वहाँ आ पहुँचीं। वे पतिवियोगके दुःखसे दुःखी, उपवास करनेके कारण दुर्बल और दीन हो रही थीं॥ ६ ॥

भूमिपर पड़े हुए भरतको उन्होंने चारों ओरसे घेर लिया और सब-की-सब रोने लगीं। कौसल्याका हृदय तो दुःखसे और भी कातर हो उठा। उन्होंने भरतके पास जाकर उन्हें अपनी गोदमें चिपका लिया॥ ७ ॥

जैसे वत्सला गौ अपने बछड़ेको गलेसे लगाकर चाटती है, उसी तरह शोकसे व्याकुल हुईं तपस्विनी कौसल्याने भरतको गोदमें लेकर रोते-रोते पूछा—॥

‘बेटा! तुम्हारे शरीरको कोई रोग तो कष्ट नहीं पहुँचा रहा है? अब इस राजवंशका जीवन तुम्हारे ही अधीन है॥ ९ ॥