श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 742, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंछियानबेवाँ सर्ग
वन-जन्तुओंके भागनेका कारण जाननेके लिये श्रीरामकी आज्ञासे लक्ष्मणका शाल-वृक्षपर चढ़कर भरतकी सेनाको देखना और उनके प्रति अपना रोषपूर्ण उद्गार प्रकट करना
इस प्रकार मिथिलेशकुमारी सीताको मन्दाकिनी नदीका दर्शन कराकर उस समय श्रीरामचन्द्रजी पर्वतके समतल प्रदेशमें उनके साथ बैठ गये और तपस्वी-जनोंके उपभोगमें आने योग्य फल-मूलके गूदेसे उनकी मानसिक प्रसन्नताको बढ़ाने—उनका लालन करने लगे॥ १ ॥
धर्मात्मा रघुनन्दन सीताजीके साथ इस प्रकारकी बातें कर रहे थे—‘प्रिये! यह फल परम पवित्र है। यह बहुत स्वादिष्ट है तथा इस कन्दको अच्छी तरह आगपर सेका गया है’॥ २ ॥
इस प्रकार वे उस पर्वतीय प्रदेशमें बैठे हुए ही थे कि उनके पास आनेवाली भरतकी सेनाकी धूल और कोलाहल दोनों एक साथ प्रकट हुए और आकाशमें फैलने लगे॥ ३ ॥
इसी बीचमें सेनाके महान् कोलाहलसे भयभीत एवं पीड़ित हो हाथियोंके कितने ही मतवाले यूथपति अपने यूथोंके साथ सम्पूर्ण दिशाओंमें भागने लगे॥ ४ ॥
श्रीरामचन्द्रजीने सेनासे प्रकट हुए उस महान् कोलाहलको सुना तथा भागे जाते हुए उन समस्त यूथपतियोंको भी देखा॥ ५ ॥
उन भागे हुए हाथियोंको देखकर और उस महाभयंकर शब्दको सुनकर श्रीरामचन्द्रजी उद्दीप्त तेजवाले सुमित्राकुमार लक्ष्मणसे बोले— ॥ ६ ॥
‘लक्ष्मण! इस जगत्में तुमसे ही माता सुमित्रा श्रेष्ठ पुत्रवाली हुई हैं। देखो तो सही—यह भयंकर गर्जनाके साथ कैसा गम्भीर तुमुल नाद सुनायी देता है॥ ७ ॥
‘सुमित्रानन्दन! पता तो लगाओ, इस विशाल वनमें ये जो हाथियोंके झुंड अथवा भैंसे या मृग जो सहसा सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर भाग चले हैं, इसका क्या कारण है? इन्हें सिंहोंने तो नहीं डरा दिया है अथवा कोई राजा या राजकुमार इस वनमें आकर शिकार तो नहीं खेल रहा है या दूसरा कोई हिंसक जन्तु तो नहीं प्रकट हो गया है?॥ ८-९ ॥
‘लक्ष्मण! इस पर्वतपर अपरिचित पक्षियोंका आना-जाना भी अत्यन्त कठिन है (फिर यहाँ किसी हिंसक जन्तु वा राजाका आक्रमण कैसे सम्भव है)। अतः इन सारी बातोंकी ठीक-ठीक जानकारी प्राप्त करो’॥ १० ॥