श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें‘राक्षसोंके द्वारा जो आपको यह कष्ट पहुँच रहा है, इसे दूर करनेके लिये ही मैं पिताके आदेशका पालन करता हुआ इस वनमें आया हूँ॥ २३ ॥
‘आपलोगोंके प्रयोजनकी सिद्धिके लिये मैं दैवात् यहाँ आ पहुँचा हूँ। आपकी सेवाका अवसर मिलनेसे मेरे लिये यह वनवास महान् फलदायक होगा॥ २४ ॥
‘तपोधनो! मैं तपस्वी मुनियोंसे शत्रुता रखनेवाले उन राक्षसोंका युद्धमें संहार करना चाहता हूँ। आप सब महर्षि भाॅइसहित मेरा पराक्रम देखें’॥ २५ ॥
इस प्रकार उन तपोधनोंको वर देकर धर्ममें मन लगानेवाले तथा श्रेष्ठ दान देनेवाले वीर श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मण तथा तपस्वी महात्माओंके साथ सुतीक्ष्ण मुनिके पास गये॥ २६ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें छठा सर्ग पूरा हुआ॥ ६॥
१. ऋषियोंका एक समुदाय जो ब्रह्माजीके नखसे उत्पन्न हुआ है।
२. ब्रह्माजीके बाल (रोम) से प्रकट हुए महर्षियोंका समूह।
३. जो भोजनके बाद अपने बर्तन धो-पोंछकर रख देते हैं, दूसरे समयके लिये कुछ नहीं बचाते।
४. सूर्य अथवा चन्द्रमाकी किरणोंका पान करके रहनेवाले।
५. कच्चे अन्नको पत्थरसे कूटकर खानेवाले।
६. पत्तोंका आहार करनेवाले।
७. दाँतोंसे ही ऊखलका काम लेनेवाले।
८. कण्ठतक पानीमें डूबकर तपस्या करनेवाले।
९. शरीरसे ही शय्याका काम लेनेवाले अर्थात् बिना बिछौनेके ही भुजापर सिर रखकर सोनेवाले।
१०. शय्याके साधनोंसे रहित।
११. निरन्तर सत्कर्ममें लगे रहनेके कारण कभी अवकाश न पानेवाले।
१२. जल पीकर रहनेवाले।
१३. हवा पीकर जीवननिर्वाह करनेवाले।
१४. खुले मैदानमें रहनेवाले।
१५. वेदीपर सोनेवाले।
१६. पर्वतशिखर आदि ऊँचे स्थानोंमें निवास करनेवाले।
१७. मन और इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले।
१८. सदा भीगे कपड़े पहननेवाले।
१९. निरन्तर जप करनेवाले।
२०. तपस्या अथवा परमात्मतत्त्वके विचारमें स्थित रहनेवाले।
२१. गर्मीके मौसममें ऊपरसे सूर्यका और चारों ओरसे अग्निका ताप सहन करनेवाले।