भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

पृष्ठ 855, कुल 2621 में से

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नवाँ सर्ग

सीताका श्रीरामसे निरपराध प्राणियोंको न मारने और अहिंसा-धर्मका पालन करनेके लिये अनुरोध

सुतीक्ष्णकी आज्ञा लेकर वनकी ओर प्रस्थित हुए अपने स्वामी रघुकुलनन्दन श्रीरामसे सीताने स्नेहभरी मनोहर वाणीमें इस प्रकार कहा— ॥ १ ॥

‘आर्यपुत्र! यद्यपि आप महान् पुरुष हैं तथापि अत्यन्त सूक्ष्म विधिसे विचार करनेपर आप अधर्मको प्राप्त हो रहे हैं। जब कामजनित व्यसनसे आप सर्वथा निवृत्त हैं, तब यहाँ इस अधर्मसे भी बच सकते हैं॥ २ ॥

‘इस जगत्में कामसे उत्पन्न होनेवाले तीन ही व्यसन होते हैं। मिथ्याभाषण बहुत बड़ा व्यसन है, किंतु उससे भी भारी दो व्यसन और हैं—परस्त्रीगमन और बिना वैरके ही दूसरोंके प्रति क्रूरतापूर्ण बर्ताव। रघुनन्दन! इनमेंसे मिथ्याभाषणरूप व्यसन तो न आपमें कभी हुआ है और न आगे होगा ही॥ ३-४ ॥

‘परस्त्रीविषयक अभिलाषा तो आपको हो ही कैसे सकती है? नरेन्द्र! धर्मका नाश करनेवाली यह कुत्सित इच्छा न आपके मनमें कभी हुई थी, न है और न भविष्यमें कभी होनेकी सम्भावना ही है। राजकुमार श्रीराम! यह दोष तो आपके मनमें भी कभी उदित नहीं हुआ है। (फिर वाणी और क्रियामें कैसे आ सकता है?) आप सदा ही अपनी धर्मपत्नीमें अनुरक्त रहनेवाले, धर्मनिष्ठ, सत्यप्रतिज्ञ तथा पिताकी आज्ञाका पालन करनेवाले हैं। आपमें धर्म और सत्य दोनोंकी स्थिति है। आपमें ही सब कुछ प्रतिष्ठित है॥ ५—७ ॥

‘महाबाहो! जो लोग जितेन्द्रिय हैं, वे सदा सत्य और धर्मको पूर्णरूपसे धारण कर सकते हैं। शुभदर्शी महापुरुष! आपकी जितेन्द्रियताको मैं अच्छी तरह जानती हूँ (इसीलिये मुझे विश्वास है कि आपमें पूर्वोक्त दोनों दोष कदापि नहीं रह सकते)॥ ८ ॥

‘परंतु दूसरोंके प्राणोंकी हिंसारूप जो यह तीसरा भयंकर दोष है, उसे लोग मोहवश बिना वैरविरोधके भी किया करते हैं। वही दोष आपके सामने भी उपस्थित है॥ ९ ॥

‘वीर! आपने दण्डकारण्यनिवासी ऋषियोंकी रक्षाके लिये युद्धमें राक्षसोंका वध करनेकी प्रतिज्ञा की है॥ १० ॥

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