भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 867

‘इस प्रकार इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले उन मांसभक्षी असुरोंने प्रतिदिन मिलकर सहस्रों ब्राह्मणोंका विनाश कर डाला॥ ६० ॥

‘उस समय देवताओंकी प्रार्थनासे महर्षि अगस्त्यने श्राद्धमें शाकरूपधारी उस महान् असुरको जान-बूझकर भक्षण किया॥ ६१ ॥

‘तदनन्तर श्राद्धकर्म सम्पन्न हो गया। ऐसा कहकर ब्राह्मणोंके हाथमें अवनेजनका जल दे इल्वलने भा◌ंइको सम्बोधित करके कहा, ‘निकलो’॥ ६२ ॥

‘इस प्रकार भा◌ंइको पुकारते हुए उस ब्राह्मणघाती असुरसे बुद्धिमान् मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यने हँसकर कहा— ‘जिस जीवशाकरूपधारी तेरे भा◌ंइ राक्षसको मैंने खाकर पचा लिया, वह तो यमलोकमें जा पहुँचा है। अब उसमें निकलनेकी शक्ति कहाँ है’॥ ६४ ॥

‘भा◌ंइकी मृत्युको सूचित करनेवाले मुनिके इस वचनको सुनकर उस निशाचरने क्रोधपूर्वक उन्हें मार डालनेका उद्योग आरम्भ किया॥ ६५ ॥

‘उसने ज्यों ही द्विजराज अगस्त्यपर धावा किया, त्यों ही उद्दीप्त तेजवाले उन मुनिने अपनी अग्नितुल्य दृष्टिसे उस राक्षसको दग्ध कर डाला। इस प्रकार उसकी मृत्यु हो गयी॥ ६६ ॥

‘ब्राह्मणोंपर कृपा करके जिन्होंने यह दुष्कर कर्म किया था, उन्हीं महर्षि अगस्त्यके भा◌ंइका यह आश्रम है, जो सरोवर और वनसे सुशोभित हो रहा है’॥ ६७ ॥

श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मणके साथ इस प्रकार बातचीत कर रहे थे। इतनेमें ही सूर्यदेव अस्त हो गये और संध्याका समय हो गया॥ ६८ ॥

तब भा◌ंइके साथ विधिपूर्वक सायं संध्योपासना करके श्रीरामने आश्रममें प्रवेश किया और उन महर्षिके चरणोंमें मस्तक झुकाया॥ ६९ ॥

मुनिने उनका यथावत् आदर-सत्कार किया। सीता और लक्ष्मणसहित श्रीराम वहाँ फल-मूल खाकर एक रात उस आश्रममें रहे॥ ७० ॥

वह रात बीतनेपर जब सूर्योदय हुआ, तब श्रीरामचन्द्रजीने अगस्त्यके भा◌ंइसे विदा माँगते हुए कहा— ‘भगवन्! मैं आपके चरणोंमें प्रणाम करता हूँ। यहाँ रातभर बड़े सुखसे रहा हूँ। अब आपके बड़े भा◌ंइ मुनिवर अगस्त्यका दर्शन करनेके लिये जाऊँगा। इसके लिये आपसे आज्ञा चाहता हूँ’॥ ७२ ॥