श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 871, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंपधारते। जाओ, पत्नीसहित श्रीराम और लक्ष्मणको सत्कारपूर्वक आश्रमके भीतर मेरे समीप ले आओ। तुम अबतक उन्हें ले क्यों नहीं आये?' ॥
धर्मज्ञ महात्मा अगस्त्य मुनिके ऐसा कहनेपर शिष्यने हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया और कहा— 'बहुत अच्छा अभी ले आता हूँ'॥ १२ १/२ ॥
इसके बाद वह शिष्य आश्रमसे निकलकर शीघ्रतापूर्वक लक्ष्मणके पास गया और बोला — 'श्रीरामचन्द्रजी कौन हैं? वे स्वयं आश्रममें प्रवेश करें और मुनिका दर्शन करनेके लिये चलें'॥ १३ १/२ ॥
तब लक्ष्मणने शिष्यके साथ आश्रमके द्वारपर जाकर उसे श्रीरामचन्द्रजी तथा जनककिशोरी श्रीसीताका दर्शन कराया॥ १४ १/२ ॥
शिष्यने बड़ी विनयके साथ महर्षि अगस्त्यकी कही हुई बात वहाँ दुहरायी और जो सत्कारके योग्य थे, उन श्रीरामका यथोचित रीतिसे भलीभाँति सत्कार करके वह उन्हें आश्रममें ले गया॥ १५ १/२ ॥
उस समय श्रीरामने लक्ष्मण और सीताके साथ आश्रममें प्रवेश किया। वह आश्रम शान्तभावसे रहनेवाले हरिणोंसे भरा हुआ था। आश्रमकी शोभा देखते हुए उन्होंने वहाँ ब्रह्माजीका स्थान और अग्निदेवका स्थान देखा॥ १६-१७ ॥
फिर क्रमशः भगवान् विष्णु, महेन्द्र, सूर्य, चन्द्रमा, भग, कुबेर, धाता, विधाता, वायु, पाशधारी महात्मा वरुण, गायत्री, वसु, नागराज अनन्त, गरुड़, कार्तिकेय तथा धर्मराजके पृथक्-पृथक् स्थानका निरीक्षण किया॥ १८—२० १/२ ॥
इतनेहीमें मुनिवर अगस्त्य भी शिष्योंसे घिरे हुए अग्निशालासे बाहर निकले। वीर श्रीरामने मुनियोंके आगे-आगे आते हुए उद्दीप्त तेजस्वी अगस्त्यजीका दर्शन किया और अपनी शोभाका विस्तार करनेवाले लक्ष्मणसे इस प्रकार कहा— ॥ २१-२२ ॥
'लक्ष्मण! भगवान् अगस्त्य मुनि आश्रमसे बाहर निकल रहे हैं। ये तपस्याके निधि हैं। इनके विशिष्ट तेजके आधिक्यसे ही मुझे पता चलता है कि ये अगस्त्यजी हैं'॥ २३ ॥
सूर्यतुल्य तेजस्वी महर्षि अगस्त्यके विषयमें ऐसा कहकर महाबाहु रघुनन्दनने सामनेसे आते हुए उन मुनीश्वरके दोनों चरण पकड़ लिये॥ २४ ॥