भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 909

‘आजतक जितने युद्ध हुए हैं, उनमेंसे किसीमें भी पहले मेरी कभी पराजय नहीं हुई है; यह तुमलोगोंने प्रत्यक्ष देखा है। मैं झूठ नहीं कहता हूँ॥ २३ १/२ ॥

‘मैं मतवाले ऐरावतपर चलनेवाले वज्रधारी देवराज इन्द्रको भी रणभूमिमें कुपित होकर कालके गालमें डाल सकता हूँ, फिर उन दो मनुष्योंकी तो बात ही क्या है?’॥ २४ १/२ ॥

खरकी यह गर्जना सुनकर राक्षसोंकी वह विशाल सेना, जो मौतके पाशसे बँधी हुई थी, अनुपम हर्षसे भर गयी॥ २५ १/२ ॥

उस समय युद्ध देखनेकी इच्छावाले बहुत-से पुण्यकर्मा महात्मा, ऋषि, देवता, गन्धर्व, सिद्ध और चारण वहाँ एकत्र हो गये। एकत्र हो वे सभी मिलकर एक-दूसरेसे कहने लगे—॥ २६-२७ ॥

‘गौओं और ब्राह्मणोंका कल्याण हो तथा जो अन्य लोकप्रिय महात्मा हैं, वे भी कल्याणके भागी हों। जैसे चक्रधारी भगवान् विष्णु समस्त असुरशिरोमणियोंको परास्त कर देते हैं, उसी प्रकार रघुकुलभूषण श्रीराम युद्धमें इन पुलस्त्यवंशी निशाचरोंको पराजित करें’॥ २८ १/२ ॥

ये तथा और भी बहुत-सी मङ्गलकामनासूचक बातें कहते हुए वे महर्षि और देवता कौतूहलवश विमानपर बैठकर जिनकी आयु समाप्त हो चली थी, उन राक्षसोंकी उस विशाल वाहिनीको देखने लगे॥ २९-३० ॥

खर रथके द्वारा बड़े वेगसे चलकर सारी सेनासे आगे निकल आया और श्येनगामी, पृथुग्रीव, यज्ञशत्रु, विहंगम, दुर्जय, करवीराक्ष, परुष, कालकार्मुक, हेममाली, महामाली, सर्पास्य तथा रुधिराशन—ये बारह महापराक्रमी राक्षस खरको दोनों ओरसे घेरकर उसके साथ-साथ चलने लगे॥ ३१-३२ १/२ ॥

महाकपाल, स्थूलाक्ष, प्रमाथ और त्रिशिरा—ये चार राक्षस-वीर सेनाके आगे और सेनापति दूषणके पीछे-पीछे चल रहे थे॥ ३३ ॥

राक्षस वीरोंकी वह भयंकर वेगवाली अत्यन्त दारुण सेना, जो युद्धकी अभिलाषासे आ रही थी, सहसा उन दोनों राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मणके पास जा पहुँची, मानो ग्रहोंकी पंक्ति चन्द्रमा और सूर्यके समीप प्रकाशित हो रही हो॥ ३४ ॥