भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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अड़तीसवाँ सर्ग

श्रीरामकी शक्तिके विषयमें अपना अनुभव बताकर मारीचका रावणको उनका अपराध करनेसे मना करना

‘एक समयकी बात है कि मैं अपने पराक्रमके अभिमानमें आकर पर्वतके समान शरीर धारण किये इस पृथ्वीपर चक्कर लगा रहा था। उस समय मुझमें एक हजार हाथियोंका बल था॥ १ ॥

‘मेरा शरीर नील मेघके समान काला था। मैंने कानोंमें पक्के सोनेके कुण्डल पहन रखे थे। मेरे मस्तकपर किरीट था और हाथमें परिघ। मैं ऋषियोंके मांस खाता और समस्त जगत्के मनमें भय उत्पन्न करता हुआ दण्डकारण्यमें विचर रहा था॥ २ १/२ ॥

‘उन दिनों धर्मात्मा महामुनि विश्वामित्रको मुझसे बड़ा भय हो गया था। वे स्वयं राजा दशरथके पास गये और उनसे इस प्रकार बोले—॥ ३ १/२ ॥

‘नरेश्वर! मुझे मारीच नामक राक्षससे घोर भय प्राप्त हुआ है, अतः ये श्रीराम मेरे साथ चलें और पर्वके दिन एकाग्रचित्त हो मेरी रक्षा करें’॥ ४ १/२ ॥

‘मुनिके ऐसा कहनेपर उस समय धर्मात्मा राजा दशरथने महाभाग महामुनि विश्वामित्रको इस प्रकार उत्तर दिया— ‘मुनिश्रेष्ठ! रघुकुलनन्दन रामकी अवस्था अभी बारह* वर्षसे भी कम है। इन्हें अस्त्र-शस्त्रोंके चलानेका पूरा अभ्यास भी नहीं है। आप चाहें तो मेरे साथ मेरी सारी सेना वहाँ चलेगी और मैं चतुरङ्गिणी सेनाके साथ स्वयं ही चलकर आपकी इच्छाके अनुसार उस शत्रुरूप निशाचरका वध करूँगा’॥ ६-७ १/२ ॥

‘राजाके ऐसा कहनेपर मुनि उनसे इस प्रकार बोले— ‘उस राक्षसके लिये श्रीरामके सिवा दूसरी कोऽइ शक्ति पर्याप्त नहीं है॥ ८ १/२ ॥

‘राजन्! इसमें संदेह नहीं कि आप समरभूमिमें देवताओंकी भी रक्षा करनेमें समर्थ हैं। आपने जो महान् कार्य किया है, वह तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध है॥ ९ १/२ ॥

‘शत्रुओंको संताप देनेवाले नरेश! आपके पास जो विशाल सेना है, वह आपकी इच्छा हो तो यहीं रहे (आप भी यहीं रहें)। महातेजस्वी श्रीराम बालक हैं तो भी उस राक्षसका दमन करनेमें समर्थ हैं, अतः मैं श्रीरामको ही साथ लेकर जाऊँगा; आपका कल्याण हो’॥ १०-११ ॥