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शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

by भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य

Source: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (origin)

Devanagarihipublished544 pages

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( च )

( ११ ) स्त्री न होती, तो हिमालयके पवित्र स्थान छोड़ कर कौन अपना मान मर्दन कराता ? ... २१८

( १२ ) सुन्दरीके गालके तिलकी तारीफ ... २३६

( १३ ) स्त्रीके सामने होनेसे सुखी ; पर जुदाईसे अत्यन्त दुःखी पुरुष ... २४६

( १४ ) जवानीमें ही स्त्री सुन्दरी दीखती है ; बुढ़ापेमें तो परमा-सुन्दरी भी महा कुरुपा हो जाती है २७०

( १५ ) मैं पेड़ पर बैठ ही था, कि इतनेमें किसीने आकर बिड़कीके किवाड़ खटखटाये और धरिसे कहा—“कहणा ! किवाड़ खोल” ३१५

( १६ ) उसने कहणाको गोदमें उठा लिया और छाती से लगा लिया । उनकी आवाज़से मालूम होता था, मानो गाना हो रहा है । ... ३१६

( १७ ) कहणा बाहरकी तिदरीमें आकर खड़ी है, उसके सिरके बाल बिखर रहे हैं और धोती बिल्कुल खुली हुई है ... ३१७

( १८ ) मैंने चट्टाने गंडासा चौकीदारकी गर्दन पर मारा । वह सिरपर हाथ रखकर कुछ सोचने लगा ... ३१८

( १९ ) उसने एक टाटकी बोरीमें चौकीदारकी लाश रखी और कुदाल हाथमें लेकर श्मशानको चली । ... ३१९