शृंगार शतक
Shringar Shatak
by भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य
Source: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (origin)
INDUSTRIAL ACADEMY Hindi Section Library + of Receipt
सचिव
भर्तृ हरिकृत
१२८
शृंगार शतक
अनुवादक
बाबू हरिदास वैद्य
प्रकाशक
हरिदास एगड कम्पनी
कलकत्ता
ने २१ सुकिया प्लोट के भोलानाथ पिंडित्वर्कस में
बाबू सूर्यकुमार मन्ना द्वारा
मुद्रित
जुलाई सन् १९२५ ई०
दूसरी बार ३००० ]
[ मूल्य अजिल्का ३ ]
“ सजिल् ३॥
Popular Press, Calcutta.
निवेदन ।
न १६२० ई० में, मैंने “वैराग्यशतक” और सत्र स १६२१ ई० में “नीतिशतक” का हिन्दी-अनुवाद किया था। आशा नहीं थी कि, सर्वसाधारण उन मामूली अनुवादोंपर ऐसे रीझेंगे कि, साल ही भरके भीतर, सारी प्रतियाँ खप जायंगी; क्योंकि मुझमें ऐसे-ऐसे ग्रन्थोंके अनुवाद करने- योग्य विद्या-बुद्धि नहीं; पर भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र की छपासे जो हुआ, उसे देख मुझे सचमुच ही भारी आश्चर्य्य होता है। “वैराग्यशतक” की कापियाँ स्वतम हो गईं, तो इतने तकाज़े आये कि, हिसाब नहीं। लोगोंको दो महीने का विलम्ब भी असह्य हो गया। इससे “वैराग्यशतक” का दूसरा संस्करण फिर शीघ्र ही छपाना पड़ा और उसमें पहलेसे बहुत जियादा काम भी किया गया। पृष्ठ-संख्या २४८ के स्थानमें प्रायः ४६० और चित्र भी २० की जगह २६ कर दिये गये हैं। आशा है, कृद्दान सज्जनोंको वह पहलेसे भी अधिक पसन्द आयेगा।
वैराग्य और नीतिशतककी माँगोंके जो पत्र आते थे, उनमें
( ख )
से प्रायः सभीमें यही लिखा रहता था—“हमें आपके अनुवाद किये हुए ‘वैराग्यशतक’ और ‘नीतिशतक’ खूब पसन्द आये । अब इसी ढंगसे आप ‘शृङ्गारशतक’ का भी अनुवाद कीजिये ।” कृद्दान और सहृदय सज्जनोंके बारम्बार ऐसा लिखने से मेरा उत्साह बढ़ा और मैंने, असमर्थ और अयोग्य होने पर भी, ‘शृङ्गारशतक’ का भी अनुवाद करके छपा डाला है । यह कह देनेमें हर्ज नहीं कि, मैं अपनी सभी पुस्तकें द्वितीय और तृतीय श्रेणीके सज्जनों के लिए लिखा करता हूँ ; क्योंकि मैं भी उन्हीं श्रेणियोंमें हूँ । लाख-लाख धन्यवाद हैं, परम करुणामय जगदीशको, जिनकी प्रेरणा और कृपासे उक्त श्रेणियोंके सज्जन मेरी लिखी पुस्तकोंको अत्यधिक श्रद्धा और चाव से पढ़ते हैं । यही वजह है कि, बिना किसी प्रकारको विज्ञापन-बाज़ीके, मेरी लिखी पुस्तकोंके संस्करण-पर-संस्करण होते हैं । ऐसा होते देखकर किस लेखकको प्रसन्नता न होती होगी ?
‘नीति-शतक’ और ‘वैराग्यशतक’में, मैंने महाराजा भर्तृहरि की संक्षिप्त जीवनी लगा दी है । प्रत्येक शतकमें ही, उसी जीवनी का होना बहुतसे सज्जन पसन्द नहीं करते ; इसीसे मैंने इस ‘शृङ्गारशतक’में महाराज की जीवनी नहीं दी है । जिन्हें महाराजा की जीवनी पढ़नी हो, वे ‘नीतिशतक’ और ‘वैराग्यशतक’में उसे पढ़ लें । उन शतकोंमें, भर्तृहरि महाराजका सारा वृत्तान्त चित्रों-सहित छापा गम्य है और उसे सर्वसाधारण और अनेक विद्वानोंने पसन्द करके, उसकी प्रशंसा भी मुक्तकण्ठसे की है ।
भर्तृहरिकृत
शृंगार-शतक ।
शम्भुस्वयंभुहरयो हरिणैर्ज्ञणानां ।
येनाक्रियन्त सततं गृहकर्मदासाः ॥
वाचामगोचरचरित्रविचित्रिताय ।
तस्यै नमो भगवते कुसुमाशुषाय ॥१॥
जिन्होंने ब्रह्मा, विष्णु और महेशको, मृगनयनी कामिनियोंके शरका काम-धन्वा करनेके लिये, दास बना रक्खा है, जिनके वैचित्र्य-चरित्रोंका वर्णन वाणीसे किया नहीं जा सकता,—उन ण्पाशुष भगवान् कामदेवको हमारा नमस्कार है ॥१॥
भगवान् कामदेवकी विचित्र महिमाका पार नहीं । आपके जीब-अजीब कामोंका बखान ज़बानसे कौन कर सकता है ?
( २ )
यद्यपि आपका शस्त्र फूलोंका धनुषाण है ; तथापि आपने अपने इसी हथियारसे त्रिलोकियोंको अपने अधीन कर रक्खा है । औरों की क्या चलाई, स्वयं जगत्के रचनेवाले ब्रह्मा, पालनेवाले विष्णु और संहार करनेवाले शिवजी तकको आपने बाकी नहीं छोड़ा । इन तीनों देवताओंको भी आपने, घरका काम-धन्धा करनेके लिये, कुरङ्गनयनी सुन्दरी कामिनियोंका गुलाम बना दिया है । यद्यपि भगवान् कामदेव भगवान् विष्णुके पुत्र हैं, पर आप अपने पितासे भी बड़ गये । "गुरु गुड़ रहे और चेला चीनी हो गये" वाली कहावत आपने चरितार्थ की । आपने स्वयं अपने पिता पर ही हाथ साफ किये । उन्हें ही अनेक कुरूप मँकवाये । अपने पितासे लक्ष्मी और सकिम्णी प्रभृतिकी गुलामी करवा कर ही आपको सन्तोष नहीं हुआ । आपने उन्हें परनारी ब्रजबाताओं तककी मुहब्ततमें पागलसा कर दिया । यहाँ तक कि, उनसे मालिन और मनिहारिन तकके स्वांग भरवाये । एक बार बेचारोंको जलन्धर-पल्लो वृन्दाके यहाँ भेष बदलकर जाने तक पर मजबूर किया और शेषमें उनका फ़र्ज़ीता करवाया ।
पूर्ण योगी, श्मशान-वासी शिवजी तकको आपने नहीं छोड़ा । बेचारोंको शैलसुताका क्रांत-दास बना दिया, यहाँ तक तो खेर थी । आपने एक बार उनकी सारी सुघ-बुध हर ली और मोहिनीके पछि इस बुरी तरहसे दौड़ाया कि, हमसे तो लिखा तक नहीं जाता । एक और मोक्ति पर शिवजी समाधिमें
( ४ )
उसने अपने सामने रखा हुआ गंडासा मेरी पीठ पर मारा ... .. ३२२
( २१ ) वह महलकी छत पर शतरञ्ज खेल रही थी, वहींसे उसने उस छैल-छबीलेको देखकर, उँगलीसे उसे सबीको दिखाया और ले आनेको कहा ... .. ३४१
( २२ ) उस नौजवानने कन्दर्पकलाके पास आकर उस की कामशान्ति की ... .. ३४२
( २३ ) विदेशसे आया हुआ गुणनिधि अपनी प्रियाको आलिङ्गन करके लेट गया, पर कन्दर्पकलाने कर-वट बदल कर मुँह फेर लिया । जब उसने उसकी साड़ी खींची, तो वह पलँगसे नीचे जा बैठी... ३४८
( २४ ) पति और घरवालोंके सो जाने पर, आधी रातके समय, वह यारसे मिलने चली । चोर भी उसके पीछे लग लिया ... .. ३५२
( २५ ) उसने अपने प्यारोंको मुर्दा देखा । उसने ज्योंही उसके मुँहमें अपने मुँहका पान दिया और उसका होठ चूसने लगी, त्योंही मुँहमें घुसे हुए प्रेतने मुँहसे उसकी नाक काट ली ... ३५७
( २६ ) वह यकायक पलँगसे उठकर चिल्लाने लगी— “इसने मेरी नाक काटली है, मुझे बचाओ, नहीं तो अब यह मुझे मार डालेगा ।” ... ३५८
( ज )
( २७ ) राजाके द्वारमें एक तरफ गुणनिधि और दूसरी तरफ कन्दर्पकला । वकील-मुख्तार नीचे बैठे हैं । न्याय हो रहा है ... ... ३६०
( २८ ) स्त्रीके होठोंका अमृत पीने के लिए चन्द्रमा ने मोतीका रूप धारण किया है ... ... ४२५
( २९ ) श्रद्धाशतक, नीतिशतक और वैराग्यशतक पढ़ने वाले तीन पुरुष ... ... ४३६
मृगनयनाश्रोंका अपूर्व सुख भोगनेकी इच्छा
रखनेवालोंके लिए अमूल्य सम्मति ।
गृहस्थोंके लिए संसारमें सार क्या है ?
हम इसी ग्रन्थमें लिख आये हैं कि इस जगत्में पृथ्वी सार है, पृथ्वीपर शहर सार है, शहरमें घर सार है ; घरमें मृगनयनी, चन्द्रमुखी, मधुरमाषिणी नारी सार है और नारीमें सुरत या सम्भोग सार पदार्थ है । जो लोग सुरत-सुखको भोग नहीं करते या नहीं कर सकते, उनका इस जगत्में आना ही वृथा है ।
सुरत सुखके लिए किन चीजोंकी दृकार है ?
स्त्रीभोगका सुख वही पुरुष लूट सकता है, जो निरोग है, बलवान है, वीर्यवान और पुष्ट है । जो रोगी है, बलहीन है, वीर्यहीण है, दुबला-पतला और कमजोर है, वह स्त्री-भोगका आनन्द नहीं उठा सकता ।
निरोग और बलवान होनेके क्या उपाय हैं ?
सत्सा के सुखोंमें आरोग्यता पहला सुख है । यद्यपि “सुरत- सुख” सब सुखोंका सार माना गया है, पर बिना आरोग्य
२ हरिदास एण्ड कम्पनी, २०१ हरिसन रोड, कलकत्ता।
रहे वह सुख फीका है। कैसा ही कामी पुरुष क्यों न अगर वह बीमार है, तो उसे स्त्रो विषसे भी बुरी मालूम लगी। निरोग, रोग-रहित, बलवान और वीर्यवान को ही खी अच्छी मालूम होती है। इसलिये जो लोग संसारके सार सुख 'सुरत' का आनन्द उठाना चाहें, उन्हें सदा निरोग रहनेके उपाय करने चाहिये। निरोग रहनेके लिये इस बात की पहली जरूरत है, कि मनुष्य इस बात को जाने कि, उसे उसकी किन-किन गलतियोंसे या किन-किन मिथ्या आहार-विहारोंसे रोग होते हैं। जो इन बातों को जानेगा, वह गलती क्यों करेगा? वह मिथ्या आहार विहारोंके संकेत पाल कर बीमार क्यों होगा? जो इस बात को जानता है कि, हस्तमैथुन करनेसे पुरुषकी शिशनेन्द्रिय निकम्मी और बे-काम होजाता है, आतुर पण्ड हो जाती है, स्मरण-शक्ति जाती रहती है, चित्तमें शान्ति नहीं रहती और मौत सिर पर खड़ो रहती है—वह हस्तमैथुन जैसे मृत्युको निर्मत्रण देनेवाले काम क्यों करेगा? आज भारतके १०० में ६८ बालक और जवान, इस सत्यानाशी कुकर्मसे पुंसत्व खोकर, जीवनसे आरी आरहे हैं। वह अपने घरमें युवती स्त्रोको देख-देखकर नौ नौ आँसू रोते—बेध-हकीमों की खुशामद करते और उन्हें अपनी कड़ी कमाई का पैसा ठगाते हैं। आजकलके चटकीले-भड़कीले ठग विज्ञापनबाजोंके बी० पी० पर बी० पी० मँगा-मँगा कर धन नाश करते हैं—पर उनकी मनोकामना सिद्ध नहीं होती। गई हुई
चिन्ता-सूत्र
- ( १ ) मनोमोहिनी काम-मदसे मतवाली पुष्टकुचोंवाली सुन्दरी ... ... २७
- ( २ ) पुण्य-कर्म सञ्चय करनेसे पुष्ट कुचोंवाली सुन्दरी नारी मिलती है ... ... ६८
- ( ३ ) स्त्रियों के नितम्ब या पर्वतों के नितम्ब ... ७०
- ( ४ ) अभिसारिका नायिका जो चन्द्र-किरणों को भी सह नहीं सकती ... ... ... ६७
- ( ५ ) वसन्तमें विरहिणी सुन्दरी मनमलीन किये बेटी है १३८
- ( ६ ) गरमीके मौसममें छत पर स्त्री-पुरुष ... १४६
- ( ७ ) वर्षा-काल की अँधेरी रातमें अपने यारके पास जानेवाली अभिसारिकानायिका दुःखीऔरसुखी १६०
- ( ८ ) वर्षा की ऋतुमें शीतके मारे स्त्री-पुरुष परस्पर आलिङ्गन किये पड़े हैं। ... ... १६२
- ( ९ ) शरद की चाँदनी रातमें, रतिश्रमसे थकी हुई प्यारोके हाथोंसे लाई हुई भारीका जल १६५
- ( १० ) जो शूरवीर गजराज और मृगराज को भी मार सकता है, वही स्त्रीके सामने हाथ जोड़े खड़ा है १६३
( च )
( ११ ) स्त्री न होती, तो हिमालयके पवित्र स्थान छोड़ कर कौन अपना मान मर्दन कराता ? ... २१८
( १२ ) सुन्दरीके गालके तिलकी तारीफ ... २३६
( १३ ) स्त्रीके सामने होनेसे सुखी ; पर जुदाईसे अत्यन्त दुःखी पुरुष ... २४६
( १४ ) जवानीमें ही स्त्री सुन्दरी दीखती है ; बुढ़ापेमें तो परमा-सुन्दरी भी महा कुरुपा हो जाती है २७०
( १५ ) मैं पेड़ पर बैठ ही था, कि इतनेमें किसीने आकर बिड़कीके किवाड़ खटखटाये और धरिसे कहा—“कहणा ! किवाड़ खोल” ३१५
( १६ ) उसने कहणाको गोदमें उठा लिया और छाती से लगा लिया । उनकी आवाज़से मालूम होता था, मानो गाना हो रहा है । ... ३१६
( १७ ) कहणा बाहरकी तिदरीमें आकर खड़ी है, उसके सिरके बाल बिखर रहे हैं और धोती बिल्कुल खुली हुई है ... ३१७
( १८ ) मैंने चट्टाने गंडासा चौकीदारकी गर्दन पर मारा । वह सिरपर हाथ रखकर कुछ सोचने लगा ... ३१८
( १९ ) उसने एक टाटकी बोरीमें चौकीदारकी लाश रखी और कुदाल हाथमें लेकर श्मशानको चली । ... ३१९
( १ )
यद्यपि इस वर्ष मैंने अपने सिरसे प्रेसका भँकट हटा दिया है ; तथापि मेरे सिर पर कामोंका बड़ा बोझ रहता है, इससे जो काम दूसरा कोई अच्छे-से-अच्छा लेखक एक सालमें करेगा, बही मुझे, मजबूर होकर, २३ महिनोंमें ही, करना पड़ता है । फिर ; ऐसी भटापटीके काममें गलतियों और त्रुटियोंका रह जाना नितान्त सम्भव है । इसलिए, मैं विद्वानोंसे अत्यन्त विनीत भावसे क्षमा प्रार्थना करता हूँ । आशा है, कि उदारहृदय सज्जन मुझे क्षमा प्रदान करनेमें आना-कानो न करेंगे ।
इस शतकके अनुवादमें भी, मैंने श्रीमान् पण्डितवर ज्वाला-दत्त जी शर्मा, मुगदाबाद, के “महाकवि दाग” “ज्ञौक” और “गालिब” तथा बाबू रघुराजसिंहजी वी० ए०के “महाकवि-नजीर” से बहुत कुछ सहायता ली है ; अतः मैं उक्त दोनों उदार-हृदय सज्जनोंको हार्दिक धन्यवाद देता हूँ । स्माल काज कोर्ट, कलकत्ता, के वकील बाबू छोगमलजी चोपड़ा महोदयने मुझे, इस पुस्तकके अनुवादमें भी, मौक़े-मौक़े पर, बहुत कुछ सहायता दी है ; अतः मैं बाबू साहब मङ्गलका अतीव आभारी हूँ । वकील साहब बड़े ही विनम्र और सुशील सज्जन हैं । आपसे जिस समय जिस काममें सहायता माँगी जाती है, आप अपना हर्ज करके भी, फौरन साहाय्य प्रदान करते हैं ।
विनीत—
हरिदास ।
वर्तमान संस्करण पर वक्तव्य ।
मेरे जैसे अल्पक्षेपकका अनुवाद किया हुआ “भृङ्गार-शतक” भी जनताने उसी बाह से खुरीदा, जिस बाहसे कि उसने “नीति-शतक” और “वैराग्य-शतक” खुरीदे थे। पबलिककी क़दरानीसे ही, अभी इसी मासमें, “वैराग्य-शतक”का तीसरा और “भृङ्गार-शतक”का दूसरा संस्करण हुआ है। मेरे लिखे ग्रन्थोंको हिन्दी-भाषाभाषी इतने बावसे खुरीदते और पढ़ते हैं, इसका कारण मेरी विद्वत्ता या मेरी लेखन-शौलीकी उत्तमता नहीं, किन्तु दयामय रुग्णकी रूपा है।
इस आवृत्तिमें, मैंने “भृङ्गार-शतक”में बहुत कुछ फेरफार किया है। अनेकों बातें बढ़ा दी हैं, तभी तो यह ग्रन्थ २६३ सफोंसे ४२१ सफों पर जा पहुँचा है। चित्र भी दूने कर दिये गये हैं। पहले २५ चित्र थे, अब प्रायः २६ हैं। कागज़ भी पहलेसे बहुत बढ़िया लगाया है। इतने पर भी मूल्य नहीं बढ़ाया, वही पहलेका मूल्य रक्खा है। आशा है, जगदीशकी क्यासे, क़दरदाँ पबलिक “भृङ्गार-शतक”के इस संस्करणको पहलेसे बहुत ज़ियादा पसन्द करेगी।
इस संस्करणमें भी, मैंने बाबू रघुराज किशोर बी० ए० के “महा-कवि अकबर” और परिडित ज्वालादत्तजी शर्माके “मौलाना हाली” से जहाँ-तहाँ मदद ली है, अतएव मैं उन दोनों सज्जनोंका आभारी हूँ।
विनीत—
हरिदास ।
( ३ )
लीन थे। वहीँ वनमें मृत्युलोक-वासिनी चन्द्र सुगलोचनी परम सुन्दरी युवतियाँ, अपनी रूपच्छटासे वनको प्रकाशमान करती हुई, कौड़ा कर रही थीं। उनके अपूर्व रूप-लावण्यको देख कर, शिवजीका शान्त मन अशान्त हो गया—उनके भोगनेके लिये मचल पड़ा। शिवजी, सारा शम-दम भूल, कामके वश हो, उनके पीछे दौड़े। आप अपनी शक्तिसे उन्हें आकाशमें ले गये और उनसे भोग-विलास करने लगे। पीछे गिरिजा महारानीको जब आपकी करतूत मालूम हुई, तो उन्होंने क्रोध में भर खियोंको तो नीचे पटक और मोले भण्डारीको डांट-डपटक केलशमें लाई और ऊँच-नीच समझाकर फिर समाधिमें लगाया।
कई बार आपने चार मुँहवाले, स्तुष्टिके रचयिता, ब्रह्माको भी अपने जालमें फँसा लिया। सुनते हैं, विधाताने एक बार तो अपना निज पुत्री तकके पीछे दौड़कर अपनी घोर बदनामी कराई। इसके सिवा, एक बार ब्रह्माजी शान्तनु नामक ऋषिके पास किसी कामसे गये। उन ऋषिकी खो अमोघा अनुपम सुन्दरी थी; पर थी पतिव्रता। उस समय ऋषि घर पर न थे। अमोघाने आपके बैठनेके लिये एक आसन बिछा दिया और पूछा—“भगवन् आप किस लिये पंघारे हैं?” विधाताने कहा—“कुछ ज़रूरी काम है, पर उहाँसे कहूँगा।” ये बातें करते-करते ही आपका मन अमोघा भर मचल गया। आपको कामदेवने ऐसा व्याकुल किया कि, आपका……वहीँ आसन
:
( ४ )
पर निकल गया। आप शर्मिन्दा होकर चुपचाप चले आये। जरा देर बाद ही शान्तनु ऋषि भी आ गये। उन्होंने आसनको देखकर सारा हाल पूछा। अमोघाने सारा वृत्तान्त ज्योंका त्यों निवेदन कर दिया। सुनते ही ऋषि बोले—“धन्य कामदेव ! तुम्हारी शक्ति-सामर्थ्य की सीमा नहीं, जो तुमने जगत्के रचयितां ब्रह्माजीको भी मोहित कर दिया।”
सुरपति और गौतमनारी अहिल्याकी बातको कौन नहीं जानता? अहिल्या परमा सुन्दरी थी। देवराजका मन उस पर चल गया। आपने उससे मिलनेके बहुत कुछ दाँव-पेच लगाये, पर वह हाथ न आयी। तब आपने एक दिन तीन बार वजे रातको वहाँ जानेका विचार स्थिर किया; क्योंकि उस समय ऋषि गङ्गास्नानको चले जाते थे। आपने चन्द्रमाको साथ लिया; अतः चन्द्रमाने मुर्गा बनकर द्वार पर कुकड् कुँ कुकड् कुँ करना आरम्भ किया। ऋषि समझे कि, अब रातका अवसान हो चला। वे उठकर नहाने चले गये। देवराज उनका रूप धर घरमें घुस गये और बातें बनावकर मनमानी की। इतने में ऋषि भी स्नान करके आ गये। उन्होंने इन्हें और अहिल्या दोनोंको आप दिया। अहिल्या पत्थर की हो गई और इन्द्रके शरीरमें भग-ही-भग हो गई।
पुराणोंमें ऐसी-ऐसी अनेक कथाएँ भरी पड़ी हैं। हमने, नमूनेके तौर पर, तीन-चार यहाँ लिख दी हैं। किसीने ठीक ही कहा है:—
( ५ )
कामेन विजितो ब्रह्मा, कामेन विजितो हरिः ।
कामेन विजितः शम्भु, शक्रः कामेन निजितः ॥
अर्थात् कामदेवने ब्रह्मा, विष्णु, महेश और सुरेश—इन चारोंको जीत लिया। जब भगवान् कामदेवने ऐसों-ऐसोंको हो अपने वशमें करके, मनमाने नाच नवाये, तब और किस की कही जाय ? सार्रांश यह, भगवान् कामदेव सबसे अधिक बलवान् हैं ; इसीसे कवि महोदय, सब देवताओंको छोड़ भगवान् कामदेवको ही नमस्कार करते हैं।
पाश्चात्य विद्वानोंमेंसे एक गोथे नामक महापुरुष कहते हैं :—Cupid is even a rogue, and whoever trusts him is deceived.” कामदेव सदा छल करता है, जो उसका विश्वास करता है, वह धोखा खाता है। कोई कुछ कहे, हम तो यही कहेंगे कि, खूबसूरतोंमें बड़ी क्षमता है। खूबसूरती पुरुष को अपनी ओर उसी तरह खींचती है ; जिस तरह चुम्बक पत्थर लोहेको खींचता है। पोप महोदयने कहा भी है—“Beauty draws us with a single hair.” सुन्दरता एक बालके द्वारा भी हमको अपनी ओर खींच सकती है। चेनिंग महोदय भी कहते हैं—“Beauty is an all-pervading presence.” सौन्दर्य की सर्वत्र सत्ता है। मतलब यह है, कि पुरुष सौन्दर्य का दास है। जिसमें भी, बकौल लाबेल महाशयके “Earth’s noblest thing, a women perfected.” साध्वी की संसारका सर्वोत्तम पदार्थ है ; अतः ऐसे
( ६ )
सर्वोत्तम पदार्थसे प्रेम करना और प्रेमवश उसको गुलामी करना, कोई बुरी बात भी नहीं है। हाँ, प्रेम-क्षेत्रके बाहरकी गुलामी बेशक बुरी है; क्योंकि जे० जी० हाटैण्ड महोदय कहते हैं :—“Duty, especially out of the domain of love, is the veriest slavery in the world.” प्रेम-क्षेत्रके बाहर जो कर्तव्य किये जाते हैं, वे धृणितसे भी धृणित गुलामीसे भी बुरे हैं। तात्पर्य यह है कि, अपनी सती-साध्वी स्त्री या माशूकाकी गुलामीमें दोष नहीं; बशर्तेकि, वह सच्ची पतिव्रता हो। सती स्त्री अपने पतिकी आज्ञापालन करके, उसे हर तरह से सन्तुष्ट करके, उस पर अपना प्रभाव—रॉब जमा लेती है। लेबर महोदय कहते हैं “A chaste wife acquires an influence over her husband by obeying him.”
साध्वी स्त्री अपने पतिकी आज्ञापालन कर, उस पर अपना प्रभाव जमा लेती है। जब एक दूसरेकी हर तरहसे स्नातिर करता है; उसको प्यारकी नज़रसे देखता हुआ, उसके लिये अपना तन-मन न्यौछावर करता है; तो दूसरा ऐसा कौन होगा, जो बदला चुकानेमें घाटा रक्खेगा? बस, हमारे विष्णु भगवान् जो लक्ष्मीके घरका काम-धन्धा करते हैं और शिवजी गिरिजाराानीकी सेवकाई करते हैं, उसमें दोष ही क्या है? क्योंकि लक्ष्मी और पार्वती दोनों ही रूप, यौवन और लावण्य की ज्ञान, प्रथम श्रेणीकी प्रतिपरायणा और तन-मनसे पतितेवा करनेवाली हैं। अब रही उनकी बात; जो पराई खूबमूरत
( ७ )
रमणियोंका दासत्व स्वीकार करते हैं। उनके दासत्वमें सच्चा प्रेम और पवित्रता नहीं, केवल सौन्दर्यका प्रभाव है। सौन्दर्य अपने दर्शकोंको मंदिराकी तरह मतवाला कर देता है और वे उसी नशेके वश हो, अपने होश-हवास खो, अपनी माशूकाओंकी गुलामी करने लगते हैं। कामदेव स्त्रियोंका चाकर है, वह जिसे अपना शिकार चुनती हैं, जिसे अपने अधीन करनेकी आज्ञा देती है, वह उसीको अपने पुष्पागुच्छसे क्राबूमें करके, अपनी स्वामिनियोंके हवाले कर देता है। कामदेव ही नहीं, स्वयं परमात्मा स्त्रियोंकी इच्छानुसार चलता है। अंगरेज़ीमें एक कहावत है :—“What woman wills, God wills.” जो स्त्री चाहती है, वही परमात्मा चाहता है। स्त्री और परमात्मा की एक ही इच्छा है।
दोहा ।
विधि हरि हरहु करत हैं, मृगनेनी की सेव ।
वचन अगोचर चरित गति, नमो कुसुमसर देव ॥१॥
सार—कामदेवने त्रिलोकीको स्त्रियोंका गुलाम बना रक्खा है।
1. I bow to that Lord Kamdeva ( Cupid ) who has flowers for his weapon, whose wonderful actions are beyond the power of speech and by whom Shambhu, the self-born ( Brahma ) and Hari have been rendered constant servants of the deer-eyed women to discharge their house-hold duties.
( ८ )
स्मितेन भावेन च लज्जया भिया ।
प्राङ्मुखैरुर्ध्वकटाक्षीनीक्षणैः ॥
वचोभिरिष्यांकलहेन लीलया ।
समस्तभावेः खलु बन्धनं स्त्रियः ॥२॥
‘मन्द-मन्द मुस्कराना, लजाना, भयभीत होना, मुँह फेर लेना, तिरछी नज़रसे देखना, मीठी-मीठी बातें करना, ईर्षा करना, कलह करना और अनेक तरहके हाव-भाव दिवाना,—ये सब स्त्रियोंमें पुरुषोंके बन्धनमें फँसानेके लिये ही होते हैं, इसमें सन्देह नहीं ॥२॥
स्त्रियोंमें हाव-भाव या नाज़-नख़रे स्वभावसे ही पैदा हो जाते हैं। ये हाव-भाव या नाज़-नख़रे पुरुषोंके मोहित करने या बन्धनमें बाँधनेके लिये उनके ब्रह्माक्ष हैं। पुरुष उनकी रूपच्छटाकी अपेक्षा उनके हाव-भावों पर जल्दी मुग्ध होता है। उनके हाव-भाव उसके दिल पर नक्काश हो जाते हैं। उन्हें वह दिन-रात याद किया करता है। पुरुषको वशीभूत करने के लिये, स्त्रियाँ उसको देखकर, होठोंमें हँसतीं या मुस्कराती हैं; कभी परले सिरकी लाज करती हैं और कभी बेहयाई; कभी किसीसे डरनेका सा नाट्य करती हैं; कभी उसकी ओर नज़र भर देखती हैं और कभी देखकर मुँह फेर लेती हैं; कभी तिरछी नज़रसे देखती हैं और कभी उसको अच्छी तरहसे देख या घूरकर भटसे घूँघट कर लेती हैं; कभी किसी बहानेसे घूँघटको हटाकर अपना चन्द्रानन उसे फिर दिखा देती हैं और
( ६ )
फिर शीघ्र ही वृद्ध कर लेती है ; कभी चलती-चलती राहमें उहर कर, अपने पैरका जेवर बिछुआ प्रभुति ठीक करने लगती है। कभी कहती हैं—“तुम उस स्त्रीके यहाँ क्यों गये ? मैं तुमसे न बोलूँगी।” पुरुष बोलना चाहता है तो कहती हैं—“वहीं जाओ, मुझसे क्या काम है ? वह बड़ी सुन्दरी है, मैं उसके मुकाबलेमें किस कामकी हूँ ?” इत्यादि। पुरुष यदि चूमना चाहता है, तो एक अजीब आन-बान और अदाके साथ उसके मुँहके पाससे अपना मुँह हटा लेती है। अगर वह स्तनों पर हाथ डालता है, तो एक अजीब अदासे उसके हाथको भटक देती है, जिससे बुरा भी न मालूम हो और पुरुष उल्टा मर मिटे। अगर पुरुष किसी दूसरीके यहाँ चढ़ा जाता है या उससे और कोई अपराध हो जाता है, तो भट आँखोंमें आँसू भर लाती है। उन आँसूओंमें कामियोंको जो मज़ा आता है,* उसे लिखकर बता नहीं सकते। बातें करतो हैं, तो निहायत मीठी-मीठी और ऐसी रस-चुली कि, पुरुष उनकी बातों पर ही कुर्बान हो जाता है। कहाँ तक लिखें, स्त्रियोंमें जवानीके समय अनन्त हाव-भाव आप ही पैदा हो जाते हैं। ये उन्हें कोई सिखाने नहीं जाता। जेवर-स्त्रियोंके रूपको हजार गुणा बढ़ा देते हैं, तो नखरे उसे लाख गुणा बढ़ा देते हैं।
- Beauty's tears are lovelier than her smiles :—Campbell. चन्द्री के आँसू उसकी मुसक्यान की अपेक्षा प्यारे लगते हैं।