शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ८ )
स्मितेन भावेन च लज्जया भिया ।
प्राङ्मुखैरुर्ध्वकटाक्षीनीक्षणैः ॥
वचोभिरिष्यांकलहेन लीलया ।
समस्तभावेः खलु बन्धनं स्त्रियः ॥२॥
‘मन्द-मन्द मुस्कराना, लजाना, भयभीत होना, मुँह फेर लेना, तिरछी नज़रसे देखना, मीठी-मीठी बातें करना, ईर्षा करना, कलह करना और अनेक तरहके हाव-भाव दिवाना,—ये सब स्त्रियोंमें पुरुषोंके बन्धनमें फँसानेके लिये ही होते हैं, इसमें सन्देह नहीं ॥२॥
स्त्रियोंमें हाव-भाव या नाज़-नख़रे स्वभावसे ही पैदा हो जाते हैं। ये हाव-भाव या नाज़-नख़रे पुरुषोंके मोहित करने या बन्धनमें बाँधनेके लिये उनके ब्रह्माक्ष हैं। पुरुष उनकी रूपच्छटाकी अपेक्षा उनके हाव-भावों पर जल्दी मुग्ध होता है। उनके हाव-भाव उसके दिल पर नक्काश हो जाते हैं। उन्हें वह दिन-रात याद किया करता है। पुरुषको वशीभूत करने के लिये, स्त्रियाँ उसको देखकर, होठोंमें हँसतीं या मुस्कराती हैं; कभी परले सिरकी लाज करती हैं और कभी बेहयाई; कभी किसीसे डरनेका सा नाट्य करती हैं; कभी उसकी ओर नज़र भर देखती हैं और कभी देखकर मुँह फेर लेती हैं; कभी तिरछी नज़रसे देखती हैं और कभी उसको अच्छी तरहसे देख या घूरकर भटसे घूँघट कर लेती हैं; कभी किसी बहानेसे घूँघटको हटाकर अपना चन्द्रानन उसे फिर दिखा देती हैं और