भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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२ हरिदास एण्ड कम्पनी, २०१ हरिसन रोड, कलकत्ता।

रहे वह सुख फीका है। कैसा ही कामी पुरुष क्यों न अगर वह बीमार है, तो उसे स्त्रो विषसे भी बुरी मालूम लगी। निरोग, रोग-रहित, बलवान और वीर्यवान को ही खी अच्छी मालूम होती है। इसलिये जो लोग संसारके सार सुख 'सुरत' का आनन्द उठाना चाहें, उन्हें सदा निरोग रहनेके उपाय करने चाहिये। निरोग रहनेके लिये इस बात की पहली जरूरत है, कि मनुष्य इस बात को जाने कि, उसे उसकी किन-किन गलतियोंसे या किन-किन मिथ्या आहार-विहारोंसे रोग होते हैं। जो इन बातों को जानेगा, वह गलती क्यों करेगा? वह मिथ्या आहार विहारोंके संकेत पाल कर बीमार क्यों होगा? जो इस बात को जानता है कि, हस्तमैथुन करनेसे पुरुषकी शिशनेन्द्रिय निकम्मी और बे-काम होजाता है, आतुर पण्ड हो जाती है, स्मरण-शक्ति जाती रहती है, चित्तमें शान्ति नहीं रहती और मौत सिर पर खड़ो रहती है—वह हस्तमैथुन जैसे मृत्युको निर्मत्रण देनेवाले काम क्यों करेगा? आज भारतके १०० में ६८ बालक और जवान, इस सत्यानाशी कुकर्मसे पुंसत्व खोकर, जीवनसे आरी आरहे हैं। वह अपने घरमें युवती स्त्रोको देख-देखकर नौ नौ आँसू रोते—बेध-हकीमों की खुशामद करते और उन्हें अपनी कड़ी कमाई का पैसा ठगाते हैं। आजकलके चटकीले-भड़कीले ठग विज्ञापनबाजोंके बी० पी० पर बी० पी० मँगा-मँगा कर धन नाश करते हैं—पर उनकी मनोकामना सिद्ध नहीं होती। गई हुई