शृंगार शतक
Shringar Shatak
by भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य
Source: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (origin)
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Read in context( ४ )
पर निकल गया। आप शर्मिन्दा होकर चुपचाप चले आये। जरा देर बाद ही शान्तनु ऋषि भी आ गये। उन्होंने आसनको देखकर सारा हाल पूछा। अमोघाने सारा वृत्तान्त ज्योंका त्यों निवेदन कर दिया। सुनते ही ऋषि बोले—“धन्य कामदेव ! तुम्हारी शक्ति-सामर्थ्य की सीमा नहीं, जो तुमने जगत्के रचयितां ब्रह्माजीको भी मोहित कर दिया।”
सुरपति और गौतमनारी अहिल्याकी बातको कौन नहीं जानता? अहिल्या परमा सुन्दरी थी। देवराजका मन उस पर चल गया। आपने उससे मिलनेके बहुत कुछ दाँव-पेच लगाये, पर वह हाथ न आयी। तब आपने एक दिन तीन बार वजे रातको वहाँ जानेका विचार स्थिर किया; क्योंकि उस समय ऋषि गङ्गास्नानको चले जाते थे। आपने चन्द्रमाको साथ लिया; अतः चन्द्रमाने मुर्गा बनकर द्वार पर कुकड् कुँ कुकड् कुँ करना आरम्भ किया। ऋषि समझे कि, अब रातका अवसान हो चला। वे उठकर नहाने चले गये। देवराज उनका रूप धर घरमें घुस गये और बातें बनावकर मनमानी की। इतने में ऋषि भी स्नान करके आ गये। उन्होंने इन्हें और अहिल्या दोनोंको आप दिया। अहिल्या पत्थर की हो गई और इन्द्रके शरीरमें भग-ही-भग हो गई।
पुराणोंमें ऐसी-ऐसी अनेक कथाएँ भरी पड़ी हैं। हमने, नमूनेके तौर पर, तीन-चार यहाँ लिख दी हैं। किसीने ठीक ही कहा है:—