शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ३ )
लीन थे। वहीँ वनमें मृत्युलोक-वासिनी चन्द्र सुगलोचनी परम सुन्दरी युवतियाँ, अपनी रूपच्छटासे वनको प्रकाशमान करती हुई, कौड़ा कर रही थीं। उनके अपूर्व रूप-लावण्यको देख कर, शिवजीका शान्त मन अशान्त हो गया—उनके भोगनेके लिये मचल पड़ा। शिवजी, सारा शम-दम भूल, कामके वश हो, उनके पीछे दौड़े। आप अपनी शक्तिसे उन्हें आकाशमें ले गये और उनसे भोग-विलास करने लगे। पीछे गिरिजा महारानीको जब आपकी करतूत मालूम हुई, तो उन्होंने क्रोध में भर खियोंको तो नीचे पटक और मोले भण्डारीको डांट-डपटक केलशमें लाई और ऊँच-नीच समझाकर फिर समाधिमें लगाया।
कई बार आपने चार मुँहवाले, स्तुष्टिके रचयिता, ब्रह्माको भी अपने जालमें फँसा लिया। सुनते हैं, विधाताने एक बार तो अपना निज पुत्री तकके पीछे दौड़कर अपनी घोर बदनामी कराई। इसके सिवा, एक बार ब्रह्माजी शान्तनु नामक ऋषिके पास किसी कामसे गये। उन ऋषिकी खो अमोघा अनुपम सुन्दरी थी; पर थी पतिव्रता। उस समय ऋषि घर पर न थे। अमोघाने आपके बैठनेके लिये एक आसन बिछा दिया और पूछा—“भगवन् आप किस लिये पंघारे हैं?” विधाताने कहा—“कुछ ज़रूरी काम है, पर उहाँसे कहूँगा।” ये बातें करते-करते ही आपका मन अमोघा भर मचल गया। आपको कामदेवने ऐसा व्याकुल किया कि, आपका……वहीँ आसन
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