भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

Devanagarihipublished544 पृष्ठ

पृष्ठ 17, कुल 544 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 17

( ६ )

सर्वोत्तम पदार्थसे प्रेम करना और प्रेमवश उसको गुलामी करना, कोई बुरी बात भी नहीं है। हाँ, प्रेम-क्षेत्रके बाहरकी गुलामी बेशक बुरी है; क्योंकि जे० जी० हाटैण्ड महोदय कहते हैं :—“Duty, especially out of the domain of love, is the veriest slavery in the world.” प्रेम-क्षेत्रके बाहर जो कर्तव्य किये जाते हैं, वे धृणितसे भी धृणित गुलामीसे भी बुरे हैं। तात्पर्य यह है कि, अपनी सती-साध्वी स्त्री या माशूकाकी गुलामीमें दोष नहीं; बशर्तेकि, वह सच्ची पतिव्रता हो। सती स्त्री अपने पतिकी आज्ञापालन करके, उसे हर तरह से सन्तुष्ट करके, उस पर अपना प्रभाव—रॉब जमा लेती है। लेबर महोदय कहते हैं “A chaste wife acquires an influence over her husband by obeying him.”

साध्वी स्त्री अपने पतिकी आज्ञापालन कर, उस पर अपना प्रभाव जमा लेती है। जब एक दूसरेकी हर तरहसे स्नातिर करता है; उसको प्यारकी नज़रसे देखता हुआ, उसके लिये अपना तन-मन न्यौछावर करता है; तो दूसरा ऐसा कौन होगा, जो बदला चुकानेमें घाटा रक्खेगा? बस, हमारे विष्णु भगवान् जो लक्ष्मीके घरका काम-धन्धा करते हैं और शिवजी गिरिजाराानीकी सेवकाई करते हैं, उसमें दोष ही क्या है? क्योंकि लक्ष्मी और पार्वती दोनों ही रूप, यौवन और लावण्य की ज्ञान, प्रथम श्रेणीकी प्रतिपरायणा और तन-मनसे पतितेवा करनेवाली हैं। अब रही उनकी बात; जो पराई खूबमूरत