भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

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अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०५ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ यस्मादजैव भोक्त्रादिरूपा | क्योंकि अजा—प्रकृति ही तस्मात्तत्स्वीकृतस्य मिथ्यासिद्ध- | भोक्तादिरूप है इसलिये उसका | कल्पना किया हुआ प्रपञ्च मिथ्या वस्तुत्वसंभवादनन्तश्चात्मा । च- | और असत् वस्तु होनेसे आत्मा तो | अनन्त ही है । मूलमें 'च' शब्द शब्दोऽवधारणे । अनन्त एवा- | निश्चयार्थक है; अर्थात् आत्मा अनन्त त्मा । अस्यान्तः परिच्छेदो | ही है, यानी देश, काल या वस्तु | किसीसे भी इसका अन्त—परिच्छेद देशतः कालतो वस्तुतो वा न | नहीं है । विश्वरूप अर्थात् विश्व विद्यत इति । विश्वरूपो विश्व- | इसीका रूप है, क्योंकि परमात्मा | स्वयं तो विश्वरूप है नहीं [अर्थात् मस्यैव रूपमिति; परस्याविश्व- | विश्वरूपमें उसका परिणाम नहीं रूपत्वात् । "वाचारम्भणं विकारो | होता ] । "विकार वाणीसे आरम्भ | होनेवाला नाममात्र है" इस श्रुतिके नामधेयम्" इति रूपस्य रूपि- | अनुसार रूप रूपवान्‌से भिन्न नहीं व्यतिरेकेणाभावाद्द्विश्वरूपत्वाद- | होता, इसलिये विश्वरूप होनेसे भी | इसकी अनन्तता ही सिद्ध होती है ।* प्यानन्त्यं सिद्धमित्यर्थः। हिशब्दो | यहाँ 'हि' शब्द 'क्योंकि' अर्थमें है, यस्मादर्थे। यस्माद्विश्वरूपवैश्वरूप्यं | क्योंकि विश्वरूप बहुरूपता परमात्मा- | का ही लक्षण है, इसलिये तात्पर्य यह लक्षणं परमात्मन इत्येवमादिभि- | है कि इन सब हेतुओंसे भी आत्माका रात्मनो विश्वरूपत्वमित्यर्थः। यत | विश्वरूपत्व सिद्ध होता है । क्योंकि

  • तात्पर्य यह है कि यद्यपि आत्मा परमार्थतः विश्वरूप नहीं है, क्योंकि ऐसा माननेसे तो वह सावयव और परिणामी सिद्ध होगा; तथापि विश्व उससे भिन्न भी नहीं है। अघटनघटनापटीयसी मायाकी महिमासे विशुद्ध आत्मतत्त्वमें ही विश्वरूपभ्रान्ति होती है। अतः आत्मासे पृथक् विश्वकी सत्ता न होनेसे उसकी अनन्ततामें कोई अन्तर नहीं आता।