श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 157, कुल 276 में से
संदर्भ में पढ़ें[अध्याय २] शाङ्करभाष्यार्थ १४३
[संस्कृत-भाष्य] सम इति । समे निम्नोन्नत- रहिते देशे । शुचौ शुद्धे। शर्करा- वह्निवालुकाविवर्जिते । शर्कराः क्षुद्रोपलाः, वालुकास्तच्चूर्णम् । तथा शब्दजलाश्रयादिभिः । शब्दः कलहादिध्वनिः जलं सर्वप्राण्युपभोग्यम् । मण्डप आ- श्रयः । मनोऽनुकूले मनोरमे चक्षु- पीडने प्रतिवाद्यभिमुखे । छान्दसो विसर्गलोपः । गुहानिवाताश्रयणे गुहायामेकान्ते निवाते समाश्रित्य प्रयोजयेत्प्रयुञ्जीत चित्तं परमा- त्मनि ॥ १०॥
[हिन्दी-अनुवाद] 'समे' इत्यादि । सम अर्थात् जो देश ऊँचाई-नीचाईसे रहित हो, तथा जो शुचि—शुद्ध हो, शर्करा, अग्नि और वालूसे रहित हो—शर्करा छोटे-छोटे पत्थरके टुकड़ोंको और बालू उनके चूरेको कहते हैं—तथा शब्द, जल और आश्रयादिसे भी शून्य हो, यानी शब्द—कलह आदिके कोलाहल, समस्त प्राणियोंके उपयोगमें आनेवाले जल (पनघट) और आश्रय— जनसाधारणके ठहरनेके स्थानसे रहित हो, मनोऽनुकूल-मनोरम हो, नेत्रोंको पीड़ा पहुँचानेवाला अर्थात् जहाँ कोई विरोधी सामने [न] हो। यहाँ 'चक्षु- पीडने' में चक्षुःके विसर्गका लोप वैदिक है। ऐसे गुहादि एकान्त और वायुशून्य स्थानमें बैठकर चित्तको प्रयुक्त करे अर्थात् परमात्मा- में लगावे ॥ १० ॥
योगसिद्धिके पूर्वलक्षण
[संस्कृत-भाष्य] इदानीं योगमभ्यस्यतोऽभि- व्यक्तिचिह्नानि वक्ष्यन्ते नीहार इत्यादिना—
[हिन्दी-अनुवाद] अब 'नीहार०' इत्यादि मन्त्रके द्वारा योगाभ्यासीको प्रकट होनेवाले ब्रह्माभिव्यक्तिके पूर्वचिह्न बतलाये जाते हैं—
नीहारधूमार्कानिलानलानां खद्योतविद्युत्स्फटिकशशीनाम् ।