भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

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पृष्ठ 158

१४४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २ एतानि रूपाणि पुरःसराणि ब्रह्मण्यभिव्यक्तिकराणि योगे ॥११॥ योगाभ्यास आरम्भ करनेपर पहले अनुभव होनेवाले कुहरे, धूम, सूर्य, वायु, अग्नि, खद्योत (जुगनू), विद्युत्, स्फटिकमणि और चन्द्रमा इनके रूप ब्रह्मकी अभिव्यक्ति करनेवाले होते हैं ॥११॥ नीहारस्तुषारः । तद्वत्प्राणैः | नीहार कुहरेको कहते हैं, प्राणों- समा चित्तवृत्तिः प्रवर्तते । ततो | के सहित चित्तवृत्ति कुहरेके समान | प्रवृत्त होने लगती है ।* उसके धूम इवाभाति । ततोऽर्कवत्ततो | पश्चात् धूआँ-सा भासने लगता है । | फिर सूर्यवत् और उसके पश्चात् वायुरिवाभाति । ततो वह्निरिवा- | वायु-सा प्रतीत होता है । तदनन्तर | वायु अग्निके समान अत्यन्त उष्ण त्युष्णो वायुः प्रकाशदहनः प्रव- | एवं प्रकाश और दाह करनेवाला र्तते । बाह्यवायुरिव संक्षुभितो | जान पड़ता है तथा बाह्यवायुके | समान अत्यन्त क्षुभित होकर बड़ा बलवान्विजृम्भते । कदाचित्ख- | बलवान् जान पड़ता है । कभी द्योतखचितमिवान्तरिक्षमालक्ष्यते । | जुगनुओंसे जगमगाता हुआ-सा आकाश विद्युदिव रोचिष्णुरालक्ष्यते | दिखायी देने लगता है, कभी | विद्युत्के समान तेजोमयी वस्तु दीखती कदाचित्स्फटिकाकृतिः । कदा- | है, कभी स्फटिकका आकार दीख चित्पूर्णशशिवत् । एतानि रूपाणि | पड़ता है और कभी पूर्ण चन्द्रमा-सा | दिखायी देता है । ब्रह्मानुसन्धानके योगे क्रियमाणे ब्रह्मण्याविष्क्रिय- | प्रयोजनसे किये जानेवाले योगमें ये माणे निमित्ते पुरःसराण्यग्रगा- | सब रूप पहले दिखायी देते हैं । | इसके पश्चात् परमयोगकी सिद्धि मीणि । तदा परमयोगसिद्धिः ११ | होती है ॥११॥

  • अर्थात् अभ्यासकालमें मनोवृत्तिके सामने कुहरा-सा छा जाता है ।