श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 159, कुल 276 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १४५ रोग, जरा और अकालमृत्युपर विजय पानेके चिह्न पृथ्व्यप्तेजोऽनिलखे समुत्थिते पञ्चात्मके योगगुणे प्रवृत्ते । न तस्य रोगो न जरा न मृत्युः प्राप्तस्य योगाग्निमयं शरीरम् ॥१२॥ पृथिवी, जल, अग्नि, वायु और आकाशकी अभिव्यक्ति होनेपर अर्थात् पञ्चभूतमय योग-गुणोंका अनुभव होनेपर जिसे योगाग्निमय शरीर प्राप्त हो गया है उस योगीको न रोग होता है, न वृद्धावस्था प्राप्त होती है और न उसकी असामयिक मृत्यु ही होती है ॥ १२ ॥ लघुत्वमारोग्यमलोलुपत्वं वर्णप्रसादं स्वरसौष्ठवं च । गन्धः शुभो मूत्रपुरीषमल्पं योगप्रवृत्तिं प्रथमां वदन्ति ॥१३॥ शरीरका हल्कापन, नीरोगता, विषयासक्तिकी निवृत्ति, शारीरिक कान्तिकी उज्ज्वलता, स्वरकी मधुरता, सुगन्ध और मल-मूत्रकी न्यूनता— इन सबको योगकी पहली सिद्धि कहते हैं ॥१३॥ पृथ्वीति । पृथ्व्यप्तेजोऽनिलखे | 'पृथ्व्यप्तेजो०' इत्यादि । 'पृथ्व्यप्तेजोऽनिलखे' इस पदसे पृथिव्यादीनि भूतानि द्वन्द्वैक- | समाहारद्वन्द्वसमाससम्बन्धी एकवद्भाव- वद्भावेन निर्दिश्यन्ते । तेषु | द्वारा पृथिवी आदि पाँच भूतोंका निर्देश किया गया है । उन पाँचों पञ्चसु भूतेषु समुत्थितेषु पञ्चात्मके | भूतोंके प्रकट होनेपर अर्थात् पञ्चात्मक योगगुणके प्रवृत्त होनेपर योगगुणे प्रवृत्त इत्यस्य व्याख्यानम्। | —इस प्रकार यह इसकी व्याख्या कः पुनर्योगगुणः प्रवर्तते ? | है । वह कौन योगगुण प्रवृत्त होता