भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

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अध्याय २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १४९

परमात्मस्वरूपका वर्णन परमात्मानमात्मत्वेन विज्ञानी- | परमात्माको आत्मभावसे जाने— यादित्युक्तं तदेव संभावय- | यह कहा गया, अब उसीका | सम्भावन (सम्मान) करते हुए मन्त्र न्नाह— | कहता है— एष ह देवः प्रदिशोऽनु सर्वाः पूर्वो ह जातः स उ गर्भे अन्तः । स एव जातः स जनिष्यमाणः प्रत्यङ्जनांस्तिष्ठति सर्वतोमुखः ॥१६॥ यह देव ही सम्पूर्ण दिशा-विदिशा है, यही [हिरण्यगर्भरूपसे] पहले उत्पन्न हुआ था, यही गर्भके अन्तर्गत है, यही उत्पन्न हुआ है और यही उत्पन्न होनेवाला है। यह समस्त जीवोंमें प्रतिष्ठित और सर्वतोमुख है ॥१६॥ एष हेति । एष एव देवः | 'एष ह' इत्यादि । यह देव ही प्रदिशः प्राच्याद्या दिश उपदि- | प्रदिश अर्थात् पूर्वादि सम्पूर्ण दिशा शश्च सर्वाः, पूर्वो ह जातः सर्व- | और उपदिशाएँ हैं, यह हिरण्यगर्भ- | रूपसे सबसे पहले उत्पन्न हुआ था, स्माद्धिरण्यगर्भात्मना, स उ गर्भे- | यही गर्भके भीतर विद्यमान है, यही ऽन्तर्वर्तमानः, स एव जातः शिशुः, | शिशुरूपसे उत्पन्न हुआ है, यही स जनिष्यमाणोऽपि, स एव सर्वांश्च | उत्पन्न होनेवाला भी है, यही समस्त जनान्प्रत्यङ् तिष्ठति, सर्वप्राणि- | जीवोंमें प्रत्यङ्—अन्तरात्मरूपसे | स्थित है, समस्त प्राणियोंके मुख गतानि मुखान्यस्येति सर्वतो- | इसीके हैं, इसलिये यह सर्वतोमुख मुखः ॥ १६ ॥ | है ॥ १६ ॥