श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ
पृष्ठ 164, कुल 276 में से
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१५० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २ ❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧ इदानीं योगवत्साधनान्तराणि | अब योगके समान नमस्कारादि | अन्य साधनोंको भी कर्त्तव्यरूपसे नमस्कारादीनि कर्तव्यत्वेन दर्श- | प्रदर्शित करनेके लिये श्रुति यितुमाह— | कहती है— यो देवो अग्नौ यो अप्सु यो विश्वं भुवनमाविवेश । य ओषधीषु यो वनस्पतिषु तस्मै देवाय नमो नमः ॥१७॥ जो देव अग्निमें है, जो जलमें है और जिसने सम्पूर्ण भुवनको व्याप्त कर रखा है तथा जो ओषधि और वनस्पतियोंमें भी विद्यमान है उस देवको नमस्कार है, नमस्कार है ॥ १७ ॥ यो देव इति । यो विश्वं | ‘यो देवो’ इत्यादि । जिसने भुवनं स्वेन विरचितं संसार- | सम्पूर्ण भुवनको अर्थात् स्वयं रचे | हुए संसारमण्डलको व्याप्त कर रखा मण्डलमाविवेश । य ओषधीषु | है, जो शालि आदि ओषधियोंमें और शाल्यादिषु वनस्पतिष्वश्वत्थादिषु | अश्वत्थादि वनस्पतियोंमें भी विद्यमान तस्मै विश्वात्मने भुवनमूलाय | है उस विश्वात्मा—जगत्के मूल | कारण परमेश्वरको नमस्कार है, परमेश्वराय नमो नमः। द्विर्वच- | नमस्कार है । ‘नमः’ शब्दकी द्विरुक्ति नमादरार्थमध्यायपरिसमाप्त्यर्थं | आदरके लिये और अध्यायकी च ॥ १७ ॥ | समाप्तिके लिये है ॥ १७ ॥
इति श्रीमद्गोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यपरमहंसपरिव्राजकाचार्य- श्रीमच्छङ्करभगवत्प्रणीते श्वेताश्वतरोपनिषद्भाष्ये द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥ ❧❦❧❦❧