श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 165, कुल 276 में से
संदर्भ में पढ़ेंतृतीय अध्याय ——— एक ही परमात्मामें शासक और शासनीयभावका समर्थन कथमाद्वितीयस्य परमात्मन | अद्वितीय परमात्मामें शासक और शासनीय आदि भाव कैसे रह सकते हैं?—ऐसी आशङ्का करके श्रुति कहती है— ईशित्रीशितव्यादिभावः ? इत्याशङ्क्याह— य एको जालवानीशत ईशनीभिः सर्वांल्लोकानी- शत ईशनीभिः। य एवैक उद्भवे सम्भवे च य एतद्वि- दुरमृतास्ते भवन्ति ॥ १ ॥ जो एक जालवान् (मायावी) अपनी ईश्वरीय शक्तियोंसे शासन करता है, जो अकेला ही ऐश्वर्यसे योग होनेपर और जगत्के प्रादुर्भावके समय अपनी शक्तियोंसे सम्पूर्ण लोकोंका शासन करता है, उसे जो जानते हैं वे अमर हो जाते हैं ॥ १ ॥ य एक इति । य एकः पर- | 'य एको' इत्यादि । जो एक परमात्मा है वह जालवान् है । मात्मा स जालवान् जालं माया | दुस्तर होनेके कारण जाल मायाका नाम है । भगवान्ने भी ऐसा ही कहा दुरत्ययत्वात् । तथा चाह भग- | है कि "मेरी मायाको पार करना कठिन है।" उस जालसे जो युक्त वान्—"मम माया दुरत्यया" | है वह [ परमात्मा ] जालवान् है । (गी० ७।१४) इति । तद्वां- | 'तत् अस्य अस्ति' (वह उसका है)* इस व्युत्पत्तिके अनुसार 'जालवान्' स्तदस्यास्तीति जालवान्मायावी- | शब्द सिद्ध होता है । जालवान् ————————————————————————————————
- 'तदस्यास्त्यस्मिन्निति मतुप्' (५।२।९४) इस पाणिनिसूत्रसे यहाँ 'मतुप्' प्रत्यय करके 'मादुपधायाश्च मतोर्वो ० ० ०' (८।२।९) इस सूत्रसे 'म'का 'व' आदेश होता है।