भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

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पृष्ठ 166

१५२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ३ त्यर्थः। ईशत ईष्टे मायोपाधिः सन्। | अर्थात् मायावी परमेश्वर मायोपाधिक | होकर शासन करता है। किनके कैः ? ईशनीभिः स्वशक्तिभिः। | द्वारा शासन करता है ? [ इसके | उत्तरमें कहते हैं-] 'ईशनीभिः' अपनी तथा चोक्तम्—ईशत ईशनीभिः | शक्तियोंके द्वारा । इसी आशयसे | यहाँ ऐसा कहा है—'ईशते ईश- परमशक्तिभिरिति। कान्? सर्वांल्लो- | नीभिः।' 'ईशनीभिः' अर्थात् अपनी | परम शक्तियोंके द्वारा शासन करता कानीशत ईशनीभिः । कदा ? | है। किनका शासन करता है ? वह | उन शक्तियोंद्वारा सम्पूर्ण लोकोंका उद्भवे विभूतियोगे सम्भवे प्रादु- | शासन करता है । किस समय ? | उद्भव—अर्थात् विभूतियों (ऐश्वर्यों) र्भावे च । य एतद्विदुरमृता | से योग होनेपर और सम्भव जगत्के | प्रादुर्भावके समय । जो इसे जानते अमरणधर्माणो भवन्ति ॥ १ ॥ | हैं वे अमृत — अमरणधर्मा ( अमर ) | हो जाते हैं ॥१॥ कस्मात्पुनर्जालवान् ? इत्या- | किन्तु वह मायावी कैसे है ? शङ्क्य आह— | ऐसी आशङ्का करके कहते हैं— एको हि रुद्रो न द्वितीयाय तस्थु- र्य इमाँल्लोकानीशत ईशनीभिः । प्रत्यङ् जनांस्तिष्ठति संचुकोचान्त- काले संसृज्य विश्वा भुवनानि गोपाः ॥२॥ क्योंकि एक ही रुद्र है, इसलिये [ ब्रह्मविद्गण ] उससे भिन्न किसी अन्य वस्तुके लिये अपेक्षा नहीं करते । वह अपनी [ ब्रह्मादि ] शक्तियों- द्वारा इन लोकोंका शासन करता है वह समस्त जीवोंके भीतर स्थित है,