भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

पृष्ठ 183, कुल 276 में से

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पृष्ठ 183

अध्याय शाङ्करभाष्यार्थ १६९ सर्वस्य जगतः प्रभुमीशानम् । | वह समस्त जगत्का प्रभु और सर्वस्य शरणं परायणं बृहत्कारणं | शासक है तथा सबका शरण— च ॥१७॥ | आश्रय और बृहत्—कारण है ॥१७॥ किञ्च— | तथा— नवद्वारे पुरे देही हँसो लेलायते बहिः । वशी सर्वस्य लोकस्य स्थावरस्य चरस्य च ॥१८॥ सम्पूर्ण स्थावर-जंगम जगत्का स्वामी यह हंस ( परमात्मा ) देहा- भिमानी होकर नव द्वारवाले [ देहरूप ] पुरमें बाह्य विषयोंको ग्रहण करनेके लिये चेष्टा किया करता है ॥ १८ ॥ नवद्वार इति । नवद्वारे शिरसि | 'नवद्वारे' इत्यादि । [ दो | आँख, दो नाक, दो कान और सप्तद्वाराणि द्वे अवाची पुरे देही | एक मुख—इन ] सात शिरके और | [ गुदा एवं लिङ्ग ] दो निम्न- विज्ञानात्मा भूत्वा कार्यकारणो- | भागके इस प्रकार नौ द्वारोंवाले | शरीरमें देही—विज्ञानात्मा यानी भूत पाधिः सन्हंसः परमात्मा हन्त्य- | और इन्द्रियरूप उपाधिवाला होकर | यह हंस—परमात्मा बाह्य विषयोंको विद्यात्मकं कार्यमिति, लेलायते | ग्रहण करनेके लिये चेष्टा करता— | चलता है। यह अविद्याजनित कार्यका चलति बहिर्विषयग्रहणाय । वशी | हनन करता है इसलिये हंस है। तथा | यह स्थावर-जंगम समस्त लोकका सर्वस्य लोकस्य स्थावरस्य चरस्य | वशी ( स्वामी ) है ॥ १८ ॥ च ॥१८॥ |