भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

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अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९

त्वादुपनिषत्समाख्यायाप्यन्यकृता- | करनेके कारण यह उपनिषद् है; | इस प्रकार नामसे भी अन्य सब त्परं श्रेय इति ब्रह्मविद्योपनिष- | साधनोंकी अपेक्षा परम श्रेयस्कर | होनेके कारण ब्रह्मविद्या 'उपनिषद्' दुच्यते । | कही जाती है । ननु भवेदेवमुपनिषदारम्भो | पूर्व०—यदि विज्ञान ही मोक्षका [कर्मणामपि मोक्षसाधनत्व-मित्याक्षेपः] यदि विज्ञानस्यैव | साधन होता तो इस प्रकार ( इस मोक्षसाधनत्वं भवेत्। | उद्देश्यसे ) उपनिषद्का आरम्भ न चैतदस्ति । कर्म- | किया जा सकता था; किन्तु ऐसी | बात है नहीं; क्योंकि “हमने णामपि मोक्षसाधनत्वावगमात्— | सोमपान किया है, अतः हम अमर “अपाम सोमममृता अभूम ।” | हो गये हैं”, “चातुर्मास्ययाग करने- | वालेका पुण्य अक्षय होता है” “अक्षय्यं ह वै चातुर्मास्ययाजिनः | इत्यादि वाक्योंसे कर्मोंका भी सुकृतं भवति” इत्यादिना । | मोक्षसाधनत्व स्वीकार किया गया है । न त्वेतदस्ति, श्रुतिस्मृतिविरो- | सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है, [उक्ताक्षेपनिरासः] धान्न्यायविरोधाच्च । | क्योंकि इससे श्रुति-स्मृतियोंका | विरोध है और यह युक्तिसे भी श्रुतिविरोधस्तावत्-- | विरुद्ध है। श्रुतिका विरोध तो इस “तद्यथेह कर्मजितो लोकः | प्रकार है—“जिस प्रकार यह कर्म- क्षीयत एवमेवामुत्र पुण्य- | द्वारा उपार्जित लोक क्षीण हो जाता जितो लोकः क्षीयते” ( छा० उ० | है उसी प्रकार वह पुण्यद्वारा प्राप्त ८।१।६) । “तमेवं विद्वान- | लोक भी क्षीण हो जाता है”, मृत इह भवति” ( नृसिंह पूर्व० | “उसीको जाननेवाला पुरुष इस | लोकमें अमर हो जाता है”, १।१६ ) नान्यः पन्था विद्यते- | “मोक्षप्राप्तिके लिये कोई दूसरा मार्ग ऽयनाय” ( श्वेता० उ० ६।१५ ) । | नहीं है”, “कर्म, प्रजा अथवा धनसे