भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

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पृष्ठ 258

२४४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६ तेषामादित्यवज्ज्ञानं ज्ञान [ समस्त रूपमात्रको प्रकाशित करनेवाले ] सूर्यके समान उस ज्ञेय प्रकाशयति तत्परम् । परमार्थतत्त्वको प्रकाशित कर देता तद्बुद्धयस्तदात्मान- है । उस परमज्ञानमें ही जिनकी बुद्धि लगी हुई है, वह ज्ञानस्वरूप स्तन्निष्ठास्तत्परायणाः ॥ परब्रह्म ही जिनका आत्मा है, उस ब्रह्ममें जिनकी दृढ निष्ठा है और गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं जो उसीके परायण [ अर्थात् आत्म- ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः ॥” रति ] हैं वे ज्ञानद्वारा समस्त दोषोंसे ( गीता ५ । १५-१७ ) मुक्त हो अपुनरावृत्तिको प्राप्त हो ॥ २० ॥ जाते हैं” ॥२०॥ श्वेताश्वतर-विद्याका सम्प्रदाय तथा इसके अधिकारी सम्प्रदायपरम्परया ब्रह्मविद्याया सम्प्रदायपरम्पराके द्वारा ब्रह्म- विद्याका मोक्षप्रदत्व प्रदर्शित करनेके मोक्षप्रदत्वं प्रदर्शयितुं सम्प्रदायं लिये श्रुति इसके सम्प्रदाय और इस विद्याके अधिकारीको प्रदर्शित विद्याधिकारिणं च दर्शयति— करती है— तपःप्रभावाद्देवप्रसादाच्च ब्रह्म ह श्वेताश्वतरोऽथ विद्वान् । अत्याश्रमिभ्यः परमं पवित्रं प्रोवाच सम्यगृषिसंघजुष्टम् ॥२१॥ श्वेताश्वतर ऋषिने तपोबल और परमात्माकी प्रसन्नतासे उस प्रसिद्ध ब्रह्मको जाना और ऋषिसमुदायसे सेवित इस परम पवित्र ब्रह्मतत्त्वका सम्यक् प्रकारसे परमहंस संन्यासियोंको उपदेश किया ॥२१॥