भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

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३६ श्वेताश्वतरोपनिषद् '[ अध्याय १ अभेदेनात्मनः शुद्धं | देखता है, और शुद्ध हो जानेके शुद्धत्वादक्षयो भवेत् ॥ | कारण यह अक्षय हो जाता है । अविद्या च क्रियाः सर्वा | समस्त कर्म अविद्यारूप हैं और ज्ञान विद्या ज्ञानं प्रचक्षते । | विद्या कहलाता है । कर्मसे जीवको कर्मणा जायते जन्तु- | जन्म लेना पड़ता है और ज्ञानसे वह र्विद्यया च विमुच्यते ॥ | मुक्त हो जाता है । अद्वैत ही परमार्थ अद्वैतं परमार्थो हि | है और द्वैत उससे भिन्न (अपरमार्थ) द्वैतं तद्भिन्न उच्यते । | कहा जाता है । हे राजन् ! पशु, पशुतिर्यङ्मनुष्याख्यं | तिर्यक्, मनुष्य और नारकी जीव— तथैव नृप नारकम् ॥ | यह चार प्रकारका भेद मिथ्या ज्ञानके चतुर्विधोऽपि भेदोऽयं | ही कारण है । मैं अन्य हूँ, यह अन्य मिथ्याज्ञाननिबन्धनः । | है और ये सब अन्य हैं—यही द्वैत अहमन्योऽपरश्चाय- | कहलानेवाला अज्ञान है । अब ममी चात्र तथापरे ॥ | अद्वैतके विषयमें श्रवण करो । अज्ञानमेतद्द्वैताख्य- | "अद्वैततत्त्व मैं-मेरा, तू-तेरा आदि मद्वैतं श्रूयतां परम् । | बुद्धिसे रहित, निर्विकल्प, निर्विकार मम त्वहमिति प्रज्ञा- | और अनिर्वचनीयरूपसे अनुभूत वियुक्तमविकल्पवत् ॥ | होता है । द्वैत मनोवृत्तिरूप है, अविकार्यमनाख्येय- | परमार्थतः अद्वैत ही तो है; अतः मद्वैतमनुभूयते । | धर्माधर्मरूप निमित्तके कारण उत्पन्न मनोवृत्तिमयं द्वैत- | हुई मनकी वृत्तियोंका निरोध करना मद्वैतं परमार्थतः ॥ | चाहिये । उनका निरोध हो जानेपर मनसो वृत्तयस्तस्मा- | द्वैतकी सिद्धि नहीं होती । द्धर्माधर्मनिमित्तजाः । | यह जो कुछ चराचर जगत् निरोद्धव्यास्तन्निरोधे | है सब मनका दृश्यमात्र है । द्वैतं नैवोपपद्यते ॥ | मनोदृष्टमिदं सर्वं | यत्किञ्चित्सचराचरम् । |