श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 51, कुल 276 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३७ मनसो ह्यमनीभावे- मनका अमनीभाव ( नाश ) हो ऽद्वैतभावं तदाप्नुयात् ॥ जानेपर यह अद्वैतभावको प्राप्त हो कर्मणां भावना येयं जाता है । यह जो कर्मोंकी भावना है सा ब्रह्मपरिपन्थिनी । वह ब्रह्मानुभवमें विघ्नरूप है, क्योंकि कर्मभावनया तुल्यं कर्मोंकी भावनाके अनुकूल ही विज्ञानमुपजायते ॥ विज्ञान प्राप्त होता है । विज्ञान तो तादृग्भवति विज्ञप्ति- वैसा ही होता है जैसी कि भावना र्यादृशी खलु भावना । होती है । अतः भावनाका नाश क्षये तस्याः परं ब्रह्म हो जानेपर परब्रह्मका स्वयं ही स्वयमेव प्रकाशते ॥ अनुभव होने लगता है । हे राजन् ! परात्मनोर्मनुष्येन्द्र आत्मा और परब्रह्मका जो विभाग है विभागोऽज्ञानकल्पितः । वह अज्ञानकल्पित ही है । इसीसे क्षये तस्यात्मपरयो- उसका क्षय हो जानेपर फिर आत्मा रविभागोऽत एव हि ॥ और परब्रह्मका अभेद ही निश्चित आत्मा क्षेत्रज्ञसंज्ञो हि होता है । क्षेत्रज्ञसंज्ञक आत्मा प्रकृतिके संयुक्तः प्राकृतैर्गुणैः । गुणोंसे युक्त है, वही उनसे रहित तैरेव विगतः शुद्धः होकर शुद्ध होनेपर परमात्मा परमात्मा निगद्यते ॥” कहलाता है ।” तथा च श्रीविष्णुपुराणे— ऐसा ही श्रीविष्णुपुराणमें भी कहा “परमात्मा त्वमेवैको है—“हे जगत्पते ! तुम्हीं एकमात्र नान्योऽस्ति जगतः पते । परमात्मा हो; तुमसे भिन्न और कुछ भी तवैष महिमा येन नहीं है । जिससे यह चराचर जगत् व्याप्तमेतच्चराचरम् ॥ व्याप्त है वह यह तुम्हारी ही यदेतद्दृश्यते मूर्त्त- महिमा है । यह जो कुछ मूर्त्त जगत् मेतज्ज्ञानात्मनस्तव । दिखायी देता है ज्ञानस्वरूप आपका ही भ्रान्तिज्ञानेन पश्यन्ति रूप है । असंयमी लोग अपने भ्रमपूर्ण जगद्रूपमयोगिनः ॥ ज्ञानके अनुसार इसे जगद्रूप देखते हैं।