भारतकोश
सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा

स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

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( १३६ ) सिंहासनबत्तीसी. जहां आय और एक बार हाय कामकंदला, हाय कामकंदला ! पुकार उठा. चट उसने जा उसका हाथ पकड लिया और कहा मै तेरे ढूंढनेके लिये राजाकी आज्ञा पायके आयी तू उठ मेरे साथ जल्दी चल तेरा मनोरथ होगा. तेरे दुःखसे राजा निपट निपट दुःखी है यह सुनतेही उसके साथ वह होलिया. उसे ले यह दूती राजाके सम्मुख आई और कहने लगी कि, हे महाराज ! यह वही वियोगी है जिसके लिये आपने यह दुःख पाया है. तब राजाने उस ब्राह्मणसे पूंछा कि, महाराज ! आप वियोगसे किससे व्याकुल हो रहे हो सो सब बात मेरे आगे कहो तब उसने एक आह भरकर कहा-महाराज कामकंदला वियोगसे मेरी यह गती हुई हे वह राजा कामसेन पास है तू धर्मात्मा है और मैं तेरे पास आया हूं. तू मुझे उसको दिला दे तो मेरी जान बचेगी. यह बात सुनतेही राजा हँसकर बोला-सुन विप्र ! वह तो वेश्या है तूने उसके प्रेममें अपना सब धर्म कर्म छोड़ दिया यह तुझे उचित नहीं है. तब माधवने कहा महाराज ! प्रेमका पंथ न्यारा है जो नर प्रेम करते है सो अपना तन मन धर्म कर्म सब समर्पण करते है, प्रेमकी कहानी तो अकथनीय है यह मुझसे नहीं कही जाती. राजाने ये बाते सुनी और उसे अपने साथ ले मदिरमें गया और सब रानियोंके आज्ञा की कि, तुम