स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 11, कुल 190 में से
संदर्भ में पढ़ेंभूमिका देवि प्रपन्नवरदे गुणगौरि गौरि यद्गौरियं परिमितं स्रवतीह किञ्चित् । तत्स्वामिने समुचिते समये सुपाक- माकूतवेदिनि निवेदयितुं प्रसीद ।। (कश्मीरिक श्रीजगद्धर भट्ट) प्रस्तुत प्रयास में जो कुछ भी अंकित हुआ है उसके विषय में केवल इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि यह प्रातःस्मरणीय भगवत्पाद ईश्वरस्वरूप जी महाराज की अन्तःप्रेरणा का साकार रूपमात्र है । अपना तो कुछ नहीं है । अकिञ्चन के पास होता भी क्या है ? कई वर्ष पहले एक दिन अकस्मात् भगवत्पाद के द्वारा, ईश्वराश्रम ('ईशबर' श्रीनगर-कश्मीर) में नियमित रूप से चलनेवाली रविवारसीय बैठकों में श्री भट्टकल्लट की वृत्ति के सहित स्पन्द-सूत्र को पढ़ाने का आदेश मिला । आदेश सुनते ही अन्तर्हृदय में किसी अननुभूतपूर्व धड़कन का आभास होने लगा । ऐसी बात नहीं थी कि इन बैठकों में कोई शैव ग्रन्थ पढ़ाने का यह पहला अवसर था, परन्तु भगवत्पाद के सामने स्पन्दसूत्र जैसे गम्भीर एवं अनुभूतिपरक विषय पर कुछ कहना मुझ जैसे अनाड़ी के लिए हृत्कम्प का कारण बन जाना स्वाभाविक ही था । अस्तु, आदेश तो आदेश ही था । इसमें अपनी स्वीकृति या अस्वीकृति का कोई प्रश्न ही नहीं उठता था । बिल्कुल आदेशानुसार कार्य आरम्भ करना पड़ा । कुछेक शैवग्रन्थों का- स्पन्द के परिप्रेक्ष्य में, फिर से अध्ययन करना पड़ा परन्तु यथार्थ तो यह है कि इन सारे प्रयत्नों को आगे बढ़ाने में, भगवत्पाद की दयादृष्टि का सबल संबल ही मूल प्रेरणा- दायक तत्त्व था । यह संबल भी किसी अलक्षित रूप में स्वयं ही प्राप्त होता रहा । मन में, इसी बीच, अकस्मात् एक दिन यह संकल्प उठा कि संस्कृत भाषा से अनभिज्ञ परन्तु सत्शास्त्रों में रुचि रखनेवाले पाठकों के लिये, मूलसूत्रों और वृत्ति का हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत किया जाये । अपने कई हितैषी मित्रों के समक्ष इस संकल्प को अभिव्यक्त किया । प्रत्युत्तर में उन्होंने इस दिशा में तुरन्त आगे बढ़ने के लिये प्रोत्साहित किया और साथ ही यह सुझाव भी दिया कि मूलग्रन्थ के भाषानुवाद के साथ-साथ हर एक सूत्र पर अलग-अलग विवरण भी लिखा जाये ताकि रुचिसम्पन्न पाठकों को सूत्रों के साथ सम्बन्ध रखनेवाली शैव मान्यताओं को समझने में सहायता मिले । मित्रवर्ग के इस सहानुभूतिपूर्ण आग्रह को भी टालते न बना । सम्भवतः इतनी सी पूर्वपीठिका से यह बात स्वयं स्पष्ट हो जाती है कि प्रस्तुत प्रयास शैवशास्त्र के धुरन्धर एवं उद्भट विद्वानों के लिये कोई अर्थ नहीं रखता है । एक लघुदीपक