भारतकोश
स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 143, कुल 190 में से

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संवित् स्पर्श से सर्वकर्तृता १३३ अयोग्य, शब्द आदि विषयों को, स्पष्टतर रूप में अपने इन्द्रिय बोध का विषय बनाने के प्रति तीव्र उन्मुखता हो जाती है, उस समय उसकी बहिर्मुखीन रूप में प्रवहमान स्पन्द-धारा सहसा अन्तर्मुख होकर अपने मूल उद्गमस्थान सामान्य स्पन्द-सागर में डुबकी लगा लेती है और पलकभर में फिर वहर्मुख हो जाती है। सामान्य स्पन्द सागर तो चतुर्दिक्-बोध-सागर ही है अतः उसके स्पर्शमात्र से ही केवल चित्त में ही नहीं, अपितु समूची ज्ञानेन्द्रियों में भी ऐसे आन्तरिक बोधबल का संचार हो जाता है कि वे उन्हीं अस्पष्ट विषयों को स्पष्ट और यथावत् रूप में ग्रहण कर लेती हैं। पहले¹ बताया जा चुका है कि स्पन्द-शक्ति की इस आक- स्मिक, अपरलक्ष्य और विद्युत्सम अन्तःबहिः गतिशीलता को शास्त्रीय शब्दों में 'आत्मवल का स्पर्श' कहते हैं। यद्यपि स्पन्द-शक्ति की यह गतिशीलता प्रतिक्षण आंतरिक रूप में चलती रहती है तथापि साधारण प्राणियों को इसकी चेतना नहीं होती है। इसके प्रतिकूल योगियों को सद्- गुरुओं के अनुग्रह से इसका अनुभव हुआ होता है। वे तीव्रतर विमर्शात्मक अनुसन्धान और विशेष प्रकार के साधनात्मक प्रयत्नों के द्वारा इन अन्तरालवर्ती संवित् स्पर्शों को पकड़ कर उन पर स्थिर रह सकने की क्षमता प्राप्त कर लेते हैं। फलतः उनकी संकल्प-शक्ति में इस मात्रा तक तीव्रता का उदय हो जाता है कि वे आवश्यकता पड़ने पर थोड़ी सी संवेदनात्मक एकाग्रता के द्वारा अतीत, अनागत और विप्रकृष्ट विषयों को यथावत् रूप में जान सकते हैं ॥३६-३७॥ [ संवित् स्पर्श से सर्वकर्तृता ] अगले दो सूत्रों में, शाक्त-बल पर अधिष्ठित रहने वाले योगी में उदित होने वाली सर्वकर्तृता पर प्रकाश डाला जा रहा है। दोनों सूत्रों में अलग-अलग दृष्टान्तिक बातों को दृष्टान्तों के द्वारा समझाया जा रहा है:— दुर्बलोऽपि तदाक्रम्य यतः कार्ये प्रवर्तते । आच्छादयेद् बुभुक्षां च तथा योऽतिबुभुक्षितः ॥३८॥ क्षीणधातुरपि तद्बलमुत्साहलक्षणमाक्रम्य यतः कार्ये प्रवर्तते, यथा च कश्चिद् अशक्तोऽपि व्यायामाभ्यासेन महतीं शक्तिं प्राप्नोति उद्योगबलेन, तथानेन स्वभावा- नुशीलनेन बुभुक्षामपि आच्छादयति योऽतिबुभुक्षितः स्यात्, यतः सर्वत्रैवात्मस्यरूपस्य कार्यकारणसंपादनसामर्थ्यमविलम्बम् ॥३८॥ अनेनाधिष्ठिते देहे यथा सर्वज्ञतादयः । तथा स्वात्मन्यधिष्ठानात् सर्वत्रैवं भविष्यति ॥ ३९ ॥ अनेनात्मस्वभावेन अधिष्ठिते व्याप्ते शरीरे सर्वज्ञतादयो यस्मात्, तत्र स्वल्प- यूकाभक्षणमपि क्षिप्रेमेव जानाति, तथा स्वात्मन्यवहितस्य सर्वत्र सर्वज्ञता भविष्यति ॥३९॥ १. विवरण : १.८ सूत्र ।