स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 148, कुल 190 में से
संदर्भ में पढ़ें१३८ स्पन्दकारिका अतो बिन्दुरतो नादो रूपमस्मादतो रसः। प्रवर्तन्तेऽचिरेणैव क्षोभकत्वेन देहिनः ॥४२॥ अतः अस्माद् उन्मेषाद् अनुशीलयमानात् 'बिन्दुः' तेजोरूपः, 'नादः' प्रणवाख्यः शब्दः, 'रूपम्' अन्धकारे दर्शनम्, रसः अमृतास्वादो मुखे, एते क्षोभकत्वेन प्रवर्तन्ते अचिरेण कालेन ॥४२॥ अनुवाद सूत्र—उन्मेष का अनुशीलन करने से, थोड़े ही समय में, बिन्दु, नाद, रूप और रस नामवाली अमित सिद्धियां अभिव्यक्त हो जाती हैं, परन्तु जिस योगी का देहाभिमान पूर्णतया गला हुआ न हो, उसको ये क्षोभ में डाल देती हैं ॥४२॥ वृत्ति—लगातार अनुशीलन किये जाने वाले उन्मेष के द्वारा, योगी में अति अल्प समय में ही, बिन्दु अर्थात् एक प्रकार का विशेष तेज, नाद अर्थात् प्रणव नामवाला अनाहत शब्द, रूप अर्थात् प्रगाढ़ अन्धकार में भी पदार्थों को देख सकने की शक्ति और रस अर्थात् मुख में अमृत का जैसा आस्वाद, इस प्रकार की सिद्धियां अभिव्यक्त हो जाती हैं परन्तु (देहाभिमान में ही अवस्थित योगियों को) ये क्षोभ में डाल देती हैं ॥४२॥ विवरण सूत्र में चार प्रकार की अपरसिद्धियों के पारिभाषिक नामों का उल्लेख किया गया है। स्पन्दशास्त्र के आचार्यों ने इनका स्वरूप वर्णन इस प्रकार किया है— १. बिन्दु—१पृथिवीतत्त्व की धारणा देनेवाले योगियों को, एकाग्र ध्यान करने की प्रखरता से भ्रूमध्य-स्थान पर एक प्रकार का विशेष और उत्तरोत्तर बढ़ता हुआ तेज प्रकट हो जाता है। इसको बिन्दु कहते हैं। इस धारणा का पारिभाषिक नाम 'बिन्दुभेद' है। २. नाद—२आकाशतत्त्व की धारणा का अभ्यास करने वाले योगी एक विशिष्ट प्रकार के स्वयं उच्चरित ध्वनि को सुनते हैं। यह ध्वनि पहले, प्रखर वेग में बहने वाली नदी की घरघराहट के समान सुनाई देती है और अनन्तर धीरे-धीरे सूक्ष्म होती हुई, मकरन्द पीने से मस्त बने हुये भौंरे की गुनगुनाहट जैसी प्रतीत होती है। ३. रूप—३तेजस्-तत्त्व की धारणा का अभ्यास करने वाले योगियों को प्रगाढ़ अन्धकार में भी द्रष्टव्य वस्तु स्पष्टतर रूप में दिखाई देती है। १. 'बिन्दुः'—भ्रूमध्यादौ प्रदेशे ध्यानाभ्यासप्रकर्षप्रवर्धमानोत्तरोत्तरप्रसादस्तेजोविशेषो, यो बिन्दुभेदाभ्यासाद् धरातत्त्वध्यायिनामभिव्यज्यते। (स्प० का० वि०, ४. १२) २. 'नादो'—वेगवन्नद्योधनिर्घोषघनोपक्रमः क्रमसूक्ष्मीभावाभिव्यज्यमानमधुमत्तमधुकर- ध्वनितानुकारी स्वोच्चरितो ध्वनिविशेषो, यं व्योमतत्त्वाभ्यासिनः शृण्वन्ति। (स्प० का० वि०, ४. १२) ३. 'रूपं'—सन्तमसाद्यावरणेऽपि सति तत्तद् दृश्यवस्वाकारदर्शनं, यत् तेजस्तत्त्वन्यक्षनिक्षिप्त- मतयो निरीक्षन्ते। (तत्रैव)