भारतकोश
स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 149, कुल 190 में से

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लब्धि और उसका निग्रह १३९ ४. रस—जल १तत्त्व की धारणा देने वाले योगी, अपने जिह्वाग्र या उसके निकटवर्ती लंबिका (गले के अन्दर की घंटी) पर धारणा का अभ्यास करके हैं । धारणा की सिद्धि हो जाने पर उनको कोई स्वादिष्ट पदार्थ खाने के बिना ही मुख में अमृत के जैसे आस्वाद की अनुभूति होती रहती है । इसके अतिरिक्त योगियों में दिव्य २स्पर्श और गन्ध की अभिव्यक्ति भी हो जाती है परन्तु उनके विषय में पूरी जानकारी प्राप्त करते के लिए तन्त्रालोक में वर्णित भगवान् अभिनवगुप्त का दृष्टिकोण समझना आवश्यक है । प्रस्तुत सूत्र में इन दो सिद्धियों का उल्लेख नहीं किया गया है । अतः यहां पर इस विषय को छेड़ना प्रसङ्गानुकूल नहीं है । यद्यपि मालिनीविजय एवं विज्ञानभैरव जैसे रहस्यशास्त्रों में भिन्न-भिन्न धारणाओं का अभ्यास करने वाले योगियों में अभिव्यक्त होने वाली शतशः सिद्धियों के वर्णन मिलते हैं तथापि प्रस्तुत सूत्र में ग्रन्थकार ने केवल चार ही सिद्धियों का मात्र नाम-निर्देश किया है । शायद उसको ऐसा करने का विशेष अभिप्राय यह रहा होगा कि अवर-सिद्धियों के अतिरंजित वर्णन से कहीं शिष्यों के मन प्रलोभन में न पड़ जायें । स्पन्द-गुरुओं के विचारानुसार स्पन्दात्मक शाक्तभूमिका की अनुभूति प्राप्त करना ही सारी साधनाओं का मात्र लक्ष्य होना चाहिये । इससे इतर अन्य सारी तथाकथित ३योगसिद्धियाँ मायीय उपरागों से रंजित होने के कारण अवरकोटि की और सर्वथा हेय हैं । इनका स्वरूप सर्वसाधारण मनुष्यों में पाई जाने वाली अल्पज्ञतारूप अशुद्ध विद्या से तनिक भी बढ़कर नहीं है । ये तो थोड़े समय तक ही अभ्यास करने से प्रकट हो जाती हैं परन्तु अपरिपक्व योगी कभी इनके भ्रमजाल में पड़कर घमंड में इतराता हुआ मदारी जैसा बन जाता है । लोग उनके मदारी-खेलों को बड़ी योग- सिद्धियाँ समझकर उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए, अपने को चेला या चेलिन मुँडवाने के लिये हमेशा उसके पीछे पड़े रहते हैं । परन्तु अनुभवी सिद्धों ने डंके की चोट कहा है कि ४मित- सिद्धियों की सौदाबाजी, योगी को स्वरूप-समाधि से बहुत दूर भटका कर अन्धगर्त में गिरा देती है । इस विषय में भगवान् आशुतोष का आदेश यह है कि मितसिद्धियां विनायक५ अर्थात् १. 'रसो'—रसवद्वस्तुविरहेऽपि अमृतास्वादो मुखे लोलाग्रलम्बिकादिधारणानिरतैर् अप्त्तव- ध्यायिभिर्य उपलभ्यते । (तत्रैव) २. 'स्पर्श'—के विषय में विशेषरूप से द्रष्टव्य तन्त्रालोक का ग्यारहवां आह्निक । ३. गर्भः अख्यातिर्महामाया तत्र तदात्मके मितसिद्धिप्रपञ्चे यश्चित्तस्य विकासः तावन्मात्रे प्रपञ्चे संतोषः, असावेव·············'किञ्चिज्ज्ञत्वरूपा अशुद्धविद्या'·············'विकल्पात्मा भ्रमः । (शिवसूत्रवि०, २.४ ४. ते समाधावुपसर्गा व्युत्थाने सिद्धयः । (पा० यो० द०, ३. ३७) ५. वासनामात्रलाभेऽपि योऽप्रमत्तो न जायते । तमनित्येषु भोगेषु योजयन्ति विनायकाः ।। तस्मान्न तेषु संसक्तिं कुर्वीतोत्तमवाञ्छया । (मा० वि०, शिवसूत्र २.१० में उदाहृत)