भारतकोश
स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 163, कुल 190 में से

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शक्ति और क्रियाशक्ति १५३ रूप धारण कर लेती है त्यों ही उसमें (शिव में) अपनी पूर्णता और स्वतन्त्रता के विषय में शङ्का उत्पन्न हो जाती है। अपनी स्वतन्त्रता को अन्यथा रूप में समझना ही सबसे पहला 'प्रत्ययोद्भव' है। स्वतन्त्रता की डाँवाडोल परिस्थिति दो रूपों में स्फुरित होती है—(१) स्वतन्त्र ज्ञातृता की हानि, (२) स्वतन्त्रकर्तृता का अबोध। दूसरे शब्दों में इस प्रकार भी कहा जा सकता है कि स्वरूप से भिन्न ग्राह्यविषयों की उपलब्धि होते ही स्वतन्त्र आत्मा को अपने अनात्मविश्वास और अनात्मभूत शरीरादि पर आत्मविश्वास हो जाता है। यही तो सबसे बड़ा 'प्रत्ययोद्भव' है और यही मौलिक स्वातन्त्र्यहानि है। यही 'आणवमल' कहा जाता है। प्रत्ययोद्भव के द्वारा स्वातन्त्र्य के संदेह में पड़ने के साथ ही आत्मा की सर्वतोमुखी अवरोहण-प्रक्रिया का उद्भव हो जाता है। चेतन ही जड़ बन जाता है; परा वाणी ही स्थूल वैखरी-वाणी का रूप धारण कर लेती है। स्वतन्त्रज्ञातृता और कर्तृता ही संकुचित ज्ञान और क्रिया बन जाते हैं, इत्यादि। फलतः छत्तीस तत्त्वों का बहिर्मुखीन अवभासन सम्पन्न हो जाता है। इस सारी प्रक्रिया को सूत्रकार ने 'परामृतरसापाय' की संज्ञा दी है। अभी ऊपर कहा गया है कि प्रस्तुत सूत्र के शब्दों में, छत्तीस तत्त्वों का अर्थ भी व्यंग्यरूप में अन्तर्निहित है। संक्षेप में वह इस प्रकार है :— परामृत—१. अनुत्तर, अविनाशी, सर्वस्वतन्त्र, प्रकाशरूप शिव। रस—२. शिव की अभिन्न अहंविमर्शमयी स्पन्दशक्ति। (इन दो तत्त्वों में द्वित्व औपचारिक है। वास्तव में यह एक ही शिवशक्ति-सामरस्य की अवस्था है। इसी को प्रकाश की प्रधानता से शिव और विमर्श की प्रधानता से शक्ति कहा गया है)। परामृत—३. सदाशिव-तत्त्व। ४. ईश्वर-तत्त्व। ५. शुद्धविद्या-तत्त्व। (ये तीन तत्त्व भी 'परामृत' शब्द से ही वाच्य हैं क्योंकि यहाँ तक भी अभेद प्रथा उपजानेवाली तत्त्वरूपा माया का उल्लास नहीं हुआ होता है। हाँ इन तत्त्वों में पूर्वोक्त उन्मेष- निमेषात्मक उतार-चढ़ाव से ही पारस्परिक भेद माना जाता है)। प्रत्ययोद्भव—६. माया-तत्त्व। ९. राग-तत्त्व। ७. कला-तत्त्व। १०. नियति-तत्त्व। ८. विद्या-तत्त्व। ११. काल-तत्त्व। (ये छः तत्त्व भेदप्रथा को उपजानेवाली तत्त्वरूपा माया का प्रसार-रूप हैं। शास्त्रीय शब्दों में इनको 'षट्-कञ्चुक' भी कहा जाता है)। अस्वतन्त्र—१२. पुरुष-तत्त्व। (षट्-कञ्चुक में फँसा हुआ जीव अथवा शास्त्रीय शब्दों में 'पशु') अब आगे प्रत्ययोद्भव के विषयभूत तन्मात्रप्रपञ्च अर्थात् जड़ ग्राह्यवर्ग का उल्लेख एक ही शब्द के द्वारा किया गया है :—