भारतकोश
स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 172, कुल 190 में से

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१६२ स्पन्दकारिका पुर्यष्टक का भूत इस प्रकार से चिमट गया है कि वह आविष्ट जैसा बन कर, इसी को वास्त- विक स्वरूप समझता हुआ, सांसारिक विषयोपभोग के मधुमिश्रित हलाहल को मजा ले लेकर पी रहा है और इसके जन्ममरणरूप कटु परिणाम को परवश बनकर भोग रहा है । ऊपर से ब्राह्मी इत्यादि पशुशक्तियों का वर्ग इसको, स्थूल एवं सूक्ष्म अभिलाषात्मक विकल्प परम्पराओं में पग-पग पर उलझा कर, स्वरूप-चिन्तन से दूर रखने पर तुला हुआ है । संक्षेप में तात्पर्य यह है कि इसने अपने भोक्तृभाव के चिन्तामणि को भोग्यभाव की कौड़ियों के दाम बेच डाला है । कितना दुःख, कितना अज्ञान और कितनी विडम्बना है ? १पशुशक्तियों से अधिष्ठित पुर्यष्टक (वासनापिंड) से पिंड छुड़ाकर अपनी इच्छा से ही खोई हुई चक्रेश्वरता को प्राप्त कर लेना ही मानवजन्म का मुख्य उद्देश्य है । इस प्रकार की अर्थसिद्धि संसार के आघात-प्रतिघातों से भागकर, दिन रात केवल पुर्यष्टक का दुःखड़ा रोते रहने से ही सम्भव नहीं हो सकती है, अपितु जीवनक्षेत्र में सारे व्यवहार करते करते और पुर्यष्टक में रहते रहते ही लगातार अहंविमर्शात्मक अनुसन्धान के द्वारा, संसार, पुर्यष्टक, मल, अज्ञान, बन्धन, संकोच इत्यादि सारे जड़-चेतन भावों में, केवल और केवल, शाश्वत, स्पन्दमयी स्वरूपसत्ता की व्यापकता की यथार्थ अनुभूति प्राप्त करने से ही सम्भव हो सकती है । निर्मल एवं चिद्रूप विश्वात्मभाव प्राप्त कर लेने पर कोई भी तथाकथित बन्धन, २बन्धन नहीं रहता है । इस भाव को प्राप्त करने के लिए संकल्प-विकल्पात्मक चित्त को 'चित्-शक्ति' में ही विलीन करना आवश्यक है । निरन्तर तीव्र-अनुसन्धान के द्वारा स्वरूप-अनुभूति को प्राप्त करनेवाले सुप्रबुद्ध योगी, अपनी स्वतन्त्र इच्छा के अनुसार कितने ही पुर्यष्टकों, प्रत्ययोद्भवो या दूसरे द्वन्द्वात्मक भावों के सृष्टि-संहार की क्रीडा स्वयं सम्पन्न करने की क्षमता प्राप्त कर लेते हैं अतः वे इनके भोग्य न बन भोक्ता बन जाते हैं । भोक्तृभाव की स्थिर उपलब्धि ही 'चक्रेश्वरता' की उपलब्धि है । यही शिवत्व की प्राप्ति है । यही जन्म-मरणरूप संसृति का अंत है ॥५१॥ शैवशास्त्रों में गुरुशक्ति का महत्व मुक्तकंठ से स्वीकारा गया है । स्वरूप-अनुभूति के विषय में बड़ी पोथियां पढ़ने अथवा लम्बे व्याख्यान सुनने पर भी, मानव-पशु के संशय- ग्रस्त मन को तब तक संतोष प्राप्त नहीं हो सकता है जब तक अनुग्रहमूर्ति गुरुरूप में अवतीर्ण होकर, स्वयं, उसके अन्धकारावृत हृदय को लोकोत्तर प्रकाश-पुञ्ज से प्रकाशित न करे । अतः उस महामहिमामयी गुरुशक्ति के सामने नतमस्तक होना आवश्यक है :- १. प्रस्तुत सूत्र में वर्णित उद्देश्य । २. यो निश्चयः पशुजनस्य जडोऽस्मि कर्म संपाशितोऽस्मि मलिनोऽस्मि परेरितोऽस्मि । इत्येतदन्यदृढ़निश्चयलाभसिद्धा सद्यः पतिर्भवति विश्ववपुश्चिदात्मा ॥ (तं० सा०, ४ आह्निक )