स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअवस्था भेदों में स्वरूप की एकता २९ करने के लिये, अपने स्वरूप से इतर अन्य किसी आधार इत्यादि की आवश्यकता नहीं पड़ती है। पारमेश्वरी१ शक्ति चतुर्दिकू स्वतन्त्र होने के कारण कभी क्रम के अनुसार अथवा कभी क्रमात्मक पराधीनता के बिना ही कार्यनिरत है परन्तु उसका वास्तविक स्वरूप सदा अक्रम ही है। चित्-रसमयी तरलता स्वयं अपने में आश्यानता अर्थात् घनता का रूप धारण करती है और यह आश्यानता ही स्थूल प्रमेयता है। वह जितना जितना उत्तरोत्तर आश्यान होती जाती है उतनी उतनी जड़ता उभर आती है। इस आश्यानीभवन की क्रिया की अन्तिम सीमा पृथिवी-तत्त्व है। हमारे गुरु महाराज कभी-कभी मंद मुस्कान में कह डालते हैं कि “संवित् का स्वातन्त्र्य कितना विस्मयकारी है कि वह, उसी के द्वारा, अपने संविद्भाव से अवरूढ़ होकर मिट्टी बन गई है।” शास्त्रकारों ने मन्दबुद्धिवाले शिष्यों को, बाह्य-अवभास की प्रक्रिया को समझाने के लिये दर्पण-नगर की उपमा दे रखी है। जिसप्रकार२ दर्पण में पड़ा हुआ नगर इत्यादि का प्रतिबिम्ब दर्पण से पृथक् न होते हुए भी अलग जैसा दिखाई देता है उसी प्रकार चिद्दर्पण में पड़ा हुआ विश्वरूप प्रतिबिम्ब उससे भिन्न न होकर भी भिन्न जैसा दिखता है। दर्पण नगर तो एक उपमामात्र है। वास्तव में चिद्दर्पण और साधारण दर्पण में दूर का भी वास्ता नहीं है। जहाँ साधारण दर्पण प्रतिबिम्ब प्रक्रिया में दर्पण, बिम्ब और प्रतिबिम्ब तीनों अलग अलग पदार्थ होते हैं वहाँ चिद्दर्पण की प्रतिबिम्बप्रक्रिया में चैतन्य-सत्ता स्वयं ही बिम्ब प्रतिबिम्ब और दर्पण है। अतः सांसारिक शब्दार्थ-कल्पना की कोई भी अवस्था ऐसी नहीं है जिसको शिव नहीं कहा जा सकता है। फलतः३ 'ज्ञानक्रियात्मक चैतन्य' ही प्रत्येक जड़ अथवा अजड़ पदार्थ का स्वभाव है जो कि प्रत्येक अवस्था में सिद्ध और अनावृतरूप में अवस्थित है। उस विश्वात्मक स्वभाव को किसी प्रकार की भी विरोधी सत्ता की कल्पना के द्वारा झुठलाया नहीं जा सकता है ॥ २ ॥ १. ............निःशेषशक्तिचक्रक्रमाक्रमाक्रामिणी अतिक्रान्तक्रमाक्रमातिरिक्तारिक्ततदुभया- त्मतयापि अभिधीयमानापि अनेतद्रूपा अनुत्तरापरा स्वातन्त्र्यशक्तिः काप्यस्ति (शि० सू० वि०, २० पृष्ठ) २. स एव भगवान् स्वस्वातन्त्र्यादनतिरिक्तामप्यतिरिक्ततामिव जगद्रूपतां स्वभित्तौ दर्पणनगर- वत्प्रकाशयन् स्थितः (स्प० नि०, १० पृष्ठ) दर्पणबिम्बे यद्वन्नगरग्रामादि चित्रमविभागि । भाति विभागेनैव च परस्परं दर्पणदपि च ॥ विमलतमपरमभैरवबोधात् तद्वद् विभागशून्यमपि । अन्योन्यं च ततोऽपि च विभक्तमाभाति जगदेतत् ॥ (प० सा०, श्लोक १२, १३) ३. चैतन्यमात्मनो रूपं सिद्धं ज्ञानक्रियात्मकम् । तस्यानावृतरूपत्वात् शिवत्वं केन वार्यते ।। ( शि० सू० वा०, १.१५ )