भारतकोश
स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 41, कुल 190 में से

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अवस्था भेदों ने स्वरूप की एकता ३१ अवस्थाएं क्रमशः 'शाक्तभूमिका' और 'विशुद्ध-शिवभाव' की अवस्थायें हैं। सिद्ध गुरुचरणों का कथन है कि वास्तव में ये दोनों अवस्थायें एक ही सर्वोत्कृष्ट निर्विकल्प अवस्था की द्योतक हैं। इनमें केवल सूक्ष्मातिसूक्ष्म स्थिरता और अस्थिरता के अतिरिक्त कोई भेद नहीं है। इसका अभिप्राय यह कि असल में तुर्य पद ही वह पूर्ण अहंविमर्शात्मक शाक्तभूमिका है जिसको प्राप्त करने के अनन्तर सारी इतिकर्तव्यतायें समाप्त हो जाती हैं। साधक जब इसी पद पर शाश्वत स्थिरता में अवस्थित अर्थात् आरूढ़ हो जाता है, तो वही उसकी तुर्यातीत अर्थात् पूर्ण शिवभाव की अवस्था कही जाती है। यही कारण है कि हमारे स्पन्दगुरु इसी तुर्यपद (शाक्तभूमिका) को प्राप्त करने पर ही बल देते हैं क्योंकि यही पद शिवभाव को प्राप्त करने का पहला द्वार है। अस्तु, प्रस्तुत सूत्र में इन दोनों अवस्थाओं को ग्रहण करने का कोई अभिप्राय नहीं है क्योंकि ये दोनों निर्विकल्प चिद्धनता की भूमिकायें हैं। इनमें किसी प्रकार की भेदकल्पना का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। चिद्घन अवस्था सतत उदीयमान होने के कारण शाश्वत जागरण की अवस्था है अतः उस पर भेदकल्पना कैसे थोपी जा सकती है? अब रहा प्रश्न अवशिष्ट तीन अवस्थाओं का, उनके विषय में कुछ बातें अवश्य विचारणीय हैं :- इस विषय में सर्वप्रथम इस बात को ध्यान में रखना होगा कि साधनामार्ग पर चलने वाले योगियों अथवा ज्ञानियों के दृष्टिकोण से इन तीन अवस्थाओं का वही स्वरूप नहीं जो कि संसार भाव के सर्वसाधारण और दैनिक व्यवहार में अनुभव में आता है। उदाहरण के तौर पर साधारण लोगों की जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति योगियों के लिए ध्यान, धारणा और समाधि की अवस्थायें होती हैं। परन्तु प्रस्तुत सूत्र में बिल्कुल इन अवस्थाओं के उसी रूप की ओर इंगित किया गया है जो कि साधारण और दैनिक जीवन के साथ सम्बन्धित हैं। अतः यहाँ पर संक्षिप्त शब्दों में इनके इसी रूप पर कुछ प्रकाश डाला जायेगा और आगे सूत्र १८ में इनसे सम्बन्धित विशेष बातों पर प्रकाश डालने का प्रयत्न किया जायेगा। साधारणतया जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति का रूप इस प्रकार होता है- १. जाग्रत्-अवस्था—यह 'वह अवस्था है जिसमें किसी भी मितप्रमाता (किसी भी संसारी जीव) के अन्तःकरण और ज्ञानेन्द्रियां किसी ऐसे विषय को ग्रहण करने की ओर स्पन्दायमान हो जाती हैं जो कि सर्वसाधारण हो और स्थिर हो । इसका भाव यह कि इस अवस्था में इन्द्रियबोध का विषय बने हुए पदार्थ स्वप्नदशा में अनुभूयमान पदार्थों की तरह क्षणपर्यवसायी और एक ही प्रमाता के द्वारा अनुभूयमान नहीं होते हैं। किसी प्रमाता की ज्ञाने- न्द्रियां जिन पदार्थों का ग्रहण करती हैं वे उस प्रमाता के द्वारा ग्रहण न किये जाने पर भी, अलग रूपों में वर्तमान रहती हैं और साथ ही उस प्रमाता के अतिरिक्त अन्य प्रमाता भी एक ही समय पर उनका ग्रहण कर सकते हैं। घट एक पदार्थ है। उसको कोई देखे या न देखे वह तो वर्तमान रहता है और देखे जाने के समय बहुत से प्रमाता उसको एक ही समय पर देख १. 'ज्ञानं जाग्रत्' (शि० सू० १.८) ।