स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४४ स्पन्दकारिका अभिनिवेश देखने में आता है वह तो केवल अपने वास्तविक चैतन्य स्वरूप की अनुभूति की हीनता के कारण ही है। १इसके विपरीत निरन्तर अभ्यास एवं गुरुकृपा से आत्मस्वरूप की अनुभूति को प्राप्त करने वाले साधक, इन सारी उपाधियों को, दूसरे घट पट आदि ग्राह्य पदार्थों की तरह ही अपने से अलग 'इदम्' रूप में और अपने आत्मस्वरूप को विशुद्ध 'अहं' रूप में अनुभव कर लेते हैं। फलतः ऐसे व्यक्तियों को संसार के द्वन्द्व प्रभावित नहीं कर सकते हैं। अब रहता है मूढता का प्रश्न। इस विषय में कई दार्शनिकों का यह विचार है कि यदि आत्मस्वरूप में सुख दुःख इत्यादि अवस्थाओं का नितान्त अभाव अर्थात् इनकी संवेदन- हीनता ही है तो उसका स्वरूप भी २मूढता अर्थात् वेद्यपदार्थों की अनुभूति के सामर्थ्य का अभाव ही है। शास्त्रों में इस शंका का निवारण इस प्रकार किया गया है कि ३यदि कोई व्यक्ति संज्ञाहीनता अथवा प्रगाढ सुषुप्ति की अवस्था में पड़ा हुआ हो तो प्रत्यक्षरूप में उसे किसी बात का संवेदन नहीं होता है। परन्तु ज्योंही वह ऐसी अवस्था से उठता है तो कहने लगता है; 'अरे, मैं तो गहरी संवेदनहीनता (मूढता) में पड़ा हुआ था'। यदि उस समय में उसकी आत्मा सत्यतः ही मूढ बनी होती तो उसको मूढता में पड़े रहने का संवेदन ही कैसे होता ? मूढ़ता से सर्वशून्यावस्था का अभिप्राय है तो ऐसी अवस्था में रहने की अवधि का उसको किसी भी प्रकार का संवेदन नहीं होना चाहिये था, परन्तु वैसा देखने में नहीं आता है। अतः मूढता भी आत्मा का स्वरूप नहीं है। सूत्र के अन्तिम पाद में आत्मतत्त्व की परमार्थसत्ता की बात कहने से सूत्रकार ने 'असत् = सर्वाभाव' को ही शाश्वत यथार्थ मानने वाले लोगों का मुखमुद्रण किया है। सूत्रकार के मतानुसार सर्वोपाधिरहित विशुद्ध आत्मस्वरूप निश्चयपूर्वक परमार्थ-सत् है जबकि उससे इतर यह सारा कार्यरूप प्रपञ्च संवृति-सत् है। जो वस्तु परमार्थ सत् है वह कभी असत् नहीं हो सकती है। यदि उसको 'असत्' मान लिया जाये तो इस शङ्का का समाधान नहीं हो सकता है कि 'असत्' वस्तु से 'सत्' (सत्स्वरूप में दिखाई देने वाले कार्यरूप जगत् ) की उत्पत्ति कैसे हुई है ? फलतः मौलिक स्पन्दतत्त्व स्वयं 'सत्' है और इसी कारण उससे, दृश्यमान कार्यरूप 'सत्' का ही विकास होता है। सूत्र के तीसरे और चौथे पाद में शून्यवादी माध्यमिकों (बौद्ध दार्शनिकों की एक शाखा) और अभाव ब्रह्मवादी श्रुत्यन्तविदों (प्राचीन वेदान्तियों की एक शाखा) के मतों की निःसारता का प्रतिपादन किया गया है। आगे सूत्र १२ में इन दोनों वादों का यथासम्भव पर्यालोचन किया जायेगा ।। ५ ।। १. सुखदुःखयोर्बहिर्मननम् । (शि० सू०, ३. ३३) २. मूढस्य भावो मूढत्वं वेद्यवेदनसामर्थ्याभावः । (स्प० का०, पृष्ठ ३१) ३. यतः तस्यापि अवस्थान्तरे मूढोऽहमासम् इति प्रत्यवमर्शमानत्वात् वेद्यत्वं स्थितमेव केवलं तत्कालमनुपलम्भः (स्प० का० पृष्ठ ३१.),