स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 7, कुल 190 में से
संदर्भ में पढ़ेंआमुख स्वभावमवभासस्य विमर्शं विदुरन्यथा । प्रकाशोऽर्थोपरक्तोऽपि स्फटिकादिजडोपमः ॥ परिपूर्ण अनुत्तर-भाव प्रकाश एवं विमर्श की नीरक्षीरात्मक समरसता की अवस्था है । वह न तो एकान्तिक चित् है और न एकान्तिक आनन्द, अपितु दोनों के मिश्रित रूप चिदानन्द का एक ऐसा पारावार है जो कि इच्छात्मक, ज्ञानात्मक और क्रियात्मक स्फुरणा के रूप में प्रतिसमय हिलकोरें लेता रहता है । अहं-विमर्श ही उस पर-तत्त्व में विश्वात्मक चेतना के रूप में नित्य अवस्थित रहने वाली स्पन्द-शक्ति है । यही उस आलोकपुञ्ज का सारसर्वस्व, हृदय और उसमें प्रवेश पाने का लोकोत्तर सिंहद्वार है । इस विश्वात्मक स्फुरणा में ही विश्वमयता की हलचल अर्थात् इसके बहिर्मुखीन प्रसार, विश्वरूप में अवस्थित और अन्तर्मुखीन अनुत्तरधाम में ही पर्यन्तिक विश्रान्ति का रहस्य भरा हुआ है । यदि यह न होती तो कुछ न होता और शायद इस 'कुछ न होने' की जैसी कल्पना का भी नितान्त अभाव ही होता । प्रस्तुत कारिकाओं में इसी स्पन्द नामवाली पारमेश्वरी शक्ति का विश्लेषण एवं विवेचन प्रस्तुत किया गया है । जहां एक ओर भगवान सोमानन्द जैसे अनुभवी सिद्धों एवं प्रत्यभिज्ञा-शास्त्रियों ने पर- तत्त्व के प्रकाश पक्ष का सूक्ष्मातिसूक्ष्म विवेचन किया, वहां दूसरी ओर स्पन्द-शास्त्रियों ने उसके विमर्शपक्ष का विश्लेषण करके, विश्वमयता में ही उसके परिपूर्ण रूप का दर्शन करवाया, हां केवल उस दिव्य आभा का दर्शन करने के लिए आंखें चाहिये । कश्मीर शैव-दर्शन का अमर सन्देश हिन्दी संसार तक पहुँचाने की कामना से स्पन्द- कारिका और उस पर श्री भट्टकल्लटाचार्य के द्वारा लिखी गई वृत्ति का हिन्दी अनुवाद पहली बार प्रस्तुत किया जा रहा है । अनुवाद के अलावा कारिकाओं के साथ अपनी ओर से अलग- अलग विवरण भी जोड़ दिये गये हैं । आशा है कि संस्कृत भाषा से अनभिज्ञ परन्तु शैव- सिद्धान्त की मोटी-मोटी बातों को समझने के इच्छुक पाठक इस प्रयास से अवश्य लाभान्वित हो सकेंगे । स्पन्द-कारिकाओं पर श्रीभट्टकल्लटाचार्य के अतिरिक्त अन्य कतिपय आचार्यों ने भी टीकायें लिखी हैं, परन्तु आचार्यजी की लेखनी में गम्भीर आध्यात्मिक विषयों को अत्यन्त सरल शब्दों में और व्यावहारिक उदाहरणों के द्वारा बोधगम्य बनाने का जैसा अनोखा जादू भरा हुआ है, वैसा दूसरे टीकाकारों में अप्राप्य है । इसी कारण से प्रस्तुत हिन्दी अनुवाद के लिए आचार्य जी की वृत्ति को ही चुना गया है । पाठकों की सुगमता के लिए इस पुस्तक की भूमिका में भी कुछेक विषयों का स्पष्टी- करण किया गया है । सत्यु शीतलनाथ श्रीनगर—कश्मीर नीलकंठ गुर्टू ८-११-१९७९