भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( १३८ ) विकारों एवं हर प्रकार के गुण दोषों से रहित, सभी प्रकार के ज्ञानां- वरणों से रहित, समस्त भूतों के आत्मा हैं, भुवन के अन्तराल में जो कुछ भी है वह उन्हीं से व्याप्त है। वे सब प्रकार के मंगलमय गुणों से पूर्ण, श्रेष्ठ से भी श्रेष्ठतर हैं। वे सर्वेश्वर क्लेश आदि दोषों से रहित हैं। भगवान की कर्म नामक एक तीसरी अविद्या शक्ति है, जिससे सर्वगत क्षेत्रज्ञ (तटस्थ जीव) शक्ति वेष्टित है। "इत्यादि श्लोकों में परस्पर भेद का निर्देश किया गया है। "उमयेऽपि हि भेदे नैनमधीयते" "भेदव्यपदेशाच्चान्यः" "अधिकन्तु भेदनिर्देशात्" आदि सूत्रों में सूत्रकार भी उक्त कथन की पुष्टि करते हैं। "जो आत्मा में स्थित होकर संयम करते हैं, जीवात्मा जिन्हे नहीं जानता, आत्मा ही जिनका शरीर है"- "प्राज्ञ परमात्मा से संसक्त होकर"- "प्राज्ञ परमात्मा से अधिष्ठित होकर" इत्यादि श्रुतियाँ, जीवात्मा और परमात्मा के परस्पर विलक्षण रूप का निरूपण करती हैं। नापि साधनानुष्ठानेन निर्मुक्ताविद्यस्यपरेण स्वरूपैक्य संभवः अविद्याश्रयत्वयोग्यस्य तदनर्हत्वासंभवात् । यथोक्तम्-"परमात्मा त्मनोर्योगः परमार्थ इतीष्यते, मिथ्यैतदन्यद्द्रव्यं हि नैति तद्द्रव्यतां यतः" इति । मुक्तस्य तु तद्धर्मतापत्तिरेवेति भगवद्गीतासूक्तम्- "इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम् साधर्म्यमागताः, सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च।" इति इहापि-"आत्मभावं नयंत्येनं तद्ब्रह्म- ध्यायिनं मुने, विकार्यमात्मनः शक्त्या लोहमाकर्षको यथा।" इति । साधन विशेष के अनुष्ठान द्वारा, अविद्या के क्षय हो जाने के बाद भी जीवात्मा की परमात्मा के साथ एकता संभव नहीं है, क्यों कि- अविद्याश्रित जीव की अविद्या से बचे रहने की क्षमता नहीं हैं। जैसा कि कहते हैं-"परमात्मा और जीवात्मा की एकता को सत्य कहना, मिथ्या भ्रम है, क्यों कि-एक द्रव्य कभी दूसरा द्रव्य नही हो सकता।" मुक्तात्मा को भगवान के समान गुण ही प्राप्त होते हैं, ऐसा भगवद्गीता में कहा गया है-"ज्ञान का आश्रय लेकर जो मेरे समान गुणों को प्राप्त करते हैं, वे सृष्ठि में जन्म नहीं पाते और प्रलय में दुःखी नहीं होते।" ankurnagpal108@gmail.com