श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १४० ) लोकों में अप्रतिहत गति होती है।” ब्रह्मवेत्ता परमात्मा को प्राप्त करते हैं—“वह परमात्मा के साथ समस्त कामनाओं को भोगता है।” इस आनन्दमय परमात्मा को प्राप्त कर सभी प्रकार के काम्यफलों का भोग करता है। “परमात्मा रस स्वरूप है, उस रस का आस्वाद कर जीवात्मा आनन्दित होता है।” मुक्तपुरुष वहाँ जाता है। “नदियाँ जैसे समुद्र में मिलने पर अपने नाम रूप का परित्याग कर देती है, वैसे ही जीवात्मा भी अपने नाम रूप से छूटकर उस परात्पर दिव्य पुरुष को प्राप्त करता है।” ब्रह्मज्ञ पुरुष पुण्य पाप से छूट कर निरंजन परमात्मा की समता प्राप्त करता है।” इत्यादि । पराविद्यासु सर्वासु सगुणमेव ब्रह्मोपास्यम् । फलं चैकरूपमेव । अतो विद्याविकल्प इति सूत्रकारेणैव—“आनन्दादयः प्रधानस्य” “विकल्पोऽविशिष्ट फलत्वात्” इत्यादिषूक्तम्। वाक्यकारेण च सगु- णस्यैवोपास्यत्वं विद्याविकल्पश्चोक्तः “युक्तं तद् गुणकोपासनात्” इति । भाष्यकृता व्याख्यातं च “यद्यपि सच्चितः” इत्यादिना । “ब्रह्मवेद ब्रह्मैवभवति” इत्यत्रापि-“नामरूपादविमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैतिदिव्यम्”—“निरंजनः परमं साम्यमुपैति”—“परंज्योति- रूपसंपद्य स्वेनरूपेणाभिनिष्पद्यते” इत्यादिभिरैकार्थ्यात् प्राकृत- नाम रूपाभ्यां विनिर्मुक्तस्य निरस्ततत्कृतभेदस्य ज्ञानैकाकारतया ब्रह्मप्रकारतोच्यते । प्रकारैक्ये च तत्वव्यवहारो मुख्यएव, यथा सेयं गौरिति । सभी ब्रह्मविद्याओं में सगुणब्रह्म को ही उपास्य तथा ब्रह्मसारूप्यता को मोक्ष बतलाया गया है। विद्याओं की समान प्रणाली का “आनन्द- दयः प्रधानस्य” विकल्पोऽविशिष्ट फलत्वात् “सूत्रों में सूत्रकार प्रतिपादन करते हैं। वाक्यकार भी सगुण की उपास्यता तथा विद्याओं की समानता का प्रतिपादन” युक्तं तद्गुणकोपासनात्” कह कर करते हैं। “यद्यपि सच्चितः” इत्यादि में भाष्यकार भी उक्त तथ्य की ही पुष्टि करते हैं। “ब्रह्मवेत्ता ब्रह्म ही होता है”, नामरूप से विमुक्त परात्पर दिव्य पुरुष ankurnagpal108@gmail.com