भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( १४५ ) योगात् । श्रतः कोटिद्वयविनिर्मुक्ते'यमविद्येति तत्त्वविदः इति तद- युक्तम् । (वाद) इसपर भी यह कहते हैं कि—“निर्विशेष स्वयं प्रकाश ईश्वर ही एक मात्र शासन कर्त्ता है तथा समस्त जगत उनका शास्य है ‘ऐसा’ मानना दोष परिकल्पित है । स्वरूप को ढकने वाली—विविध विचित्र विक्षेपों को करने वाली, सद् असद् कुछ भी न कह सकने योग्य, अनादि अविद्या ही दोष है । “अनृतेन ही प्रत्यूढाः “इत्यादि श्रुति के अनुसार उक्त प्रकार की अविद्या का अस्तित्व स्वीकारना पड़ेगा, अस्वीकार करने से तत्वमसि “इत्यादि वाक्य से जो जीव ब्रह्म की एकता की प्रतीति होती है, वह संगत न हो सकेगी । वह अविद्या सत् पदार्थ भी नहीं है, उसे सत् मानने से उसकी भ्रांतिजनकता और ज्ञानाबाध्यता संभव नहीं होगी। अविद्या असत् भी नहीं है, असत् मानने से उसकी सामयिकी प्रतीति और बाध नहीं हो सकेगी । इसलिए तत्त्वविदों ने इसे सद् असद् कोटियों से विल- क्षण अविद्या कहा है । इसलिए तुम्हारा उपर्युक्त शास्य शासन वाला कथन असंगत है । (प्रतिवाद) सा हि किमाश्रित्य भ्रमं जनयति ? न तावज्जीव- माश्रित्यश्रविद्या परिकल्पितत्वात् जीवभावस्य । नापि ब्रह्माश्नित्य तस्य स्वयंप्रकाश ज्ञानस्वरूपत्वेनाविद्याविरोधित्वात् । सा हि ज्ञानबाध्याऽभिमता । “ज्ञानरूपं परंब्रह्म तन्निवर्त्यं मृषात्मकम् , अज्ञानंचेत् तिरस्कुर्यात् कः प्रभुः तन्निवर्त्तने”—ज्ञानं ब्रह्मेति चेत् ज्ञानमज्ञानस्य निवर्त्तकम् , ब्रह्मवत् तत्प्रकाशकत्वात् अपि हि अनिव- र्त्तकम्”—“ज्ञानं ब्रह्मेति विज्ञानमस्ति चेत्स्यात्प्रमेयता ,ब्रह्मणोऽननु- भूतित्वं त्वदुक्त्यैव प्रसज्यते”। ज्ञानस्वरूपं ब्रह्मेति ज्ञानंतस्या अविद्यायाः बाधकम्,। न स्व- रूपभूतं ज्ञानमिति चेत् ,न, उभयोरपि ब्रह्मस्वरूप प्रकाशत्वे सत्यन्यत- रस्यानविद्याविरोधित्वं अन्यतरस्यनेति विशेषानवगमात् । ankurnagpal108@gmail.com