श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १४७ ) ब्रह्मव्यतिरिक्तस्य मिथ्यात्वज्ञानमज्ञान विरोधि इति। न इदं ब्रह्मव्यतिरिक्तमिथ्यात्वज्ञानं किं ब्रह्म याथात्म्य ज्ञान विरोधि ? उत् प्रपंच सत्यत्वरूपाज्ञानविरोधीति विवेचनीयम् न तावद्ब्रह्म- याथात्म्यज्ञानविरोधि अतद्विषयत्वात् , ज्ञानाज्ञानयोरेकविषयत्वेन हि विरोधः। प्रपंच मिथ्यात्वज्ञानं तत् सत्यस्वरूपा ज्ञानेन विरुध्यते । तेन प्रपंचसत्यत्वरूपाज्ञानमेव बाधितमिति ब्रह्मस्वरूपाज्ञानं तिष्ठत्येव । ब्रह्मस्वरूपाज्ञानं नाम तस्य सद्वितीयत्वमेव । तत्तु तद् व्यतिरिक्तस्य मिथ्यात्वज्ञानेन निवृत्तम् । स्वरूपंतु स्वानुभवसिद्धमिति चेन्न, ब्रह्मणोऽद्वितीयत्वं स्वरूपं स्वानुभवसिद्धमिति तद्विरोधि सद्वितीय- त्वरूपाज्ञानं न बाधश्च न स्याताम् । अद्वितीयत्वंधर्मं इति चेन्न, अनुभवस्वरूपस्य ब्रह्मणोऽनुभाव्यधर्मं विरहस्य भवतैव प्रतिपा- दित्वात् अतोज्ञानस्वरूपस्य ब्रह्मणो विरोधादेव ना ज्ञानाश्रयत्वं । कथन यह है कि—"ज्ञान स्वरूप ब्रह्म" ऐसे ज्ञान से ब्रह्म स्वभाव की जो प्रतीति होती है, वह ब्रह्म के स्वयं प्रकाश होने से स्वतः ही प्रकाशित होता है, उसका माहात्म्यज्ञान ही अविद्या का निवारक हो, यह कोई आवश्यक बात नहीं है । बात दोनों ही एक हैं, स्वरूप ज्ञान और माहात्म्य ज्ञान दोनों ही समान वस्तु हैं । और तुम्हारे मतानुसार ब्रह्म स्वयं ही अनुभव स्वरूप है, उसके लिए किसी दूसरे अनुभव की अपेक्षा नहीं है, इसलिए तद्विषयक कोई ज्ञान नाम की वस्तु भी नहीं है ज्ञान को यदि स्वभावतः अज्ञान का विरोधी कहा जाय तो, वह स्वयं ही विरोधी हो जायगा, फिर भी उस अविद्या की ब्रह्माश्रयता संभव नहीं है । शुक्ति आदि अपनी वास्तविकता की प्रतीति कराने में स्वयं असमर्थ हैं, अज्ञान स्वरूप शुक्ति आदि को उस अज्ञान की निवृत्ति के लिए किसी अन्य ज्ञान की अपेक्षा होती है । ब्रह्म तो स्वानुभव सिद्ध है, उसे अपने वास्तविक स्वरूप का स्वयमेव ज्ञान है, इसलिए वह स्वयं ही अज्ञान का विरोधी है । तभी उसे किसी अन्य निवर्त्तक ज्ञान की अपेक्षा नहीं है । इस पर यदि यह कहो कि—ब्रह्म के अतिरिक्त पदार्थ के मिथ्यात्व का ज्ञान ही अज्ञान का विरोधी है, सो बात भी ठीक नहीं है—जिसे तुम ankurnagpal108@gmail.com